जयपुर | जयपुर के चर्चित नीरजा मोदी स्कूल प्रकरण में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विभाग द्वारा हाल ही में जारी किए गए आदेश ने अभिभावकों और शिक्षाविदों के बीच भारी असमंजस पैदा कर दिया है। शिक्षा विभाग को स्कूल में आठवीं कक्षा तक के संचालन को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लेना था, जिसे फिलहाल टाल दिया गया है।
नीरजा मोदी स्कूल: शिक्षा विभाग का आदेश: जयपुर नीरजा मोदी स्कूल केस: शिक्षा विभाग के ‘कॉपी-पेस्ट’ आदेश से मचा बवाल, 8वीं तक की कक्षाओं पर फैसला टला
जयपुर के नीरजा मोदी स्कूल मामले में शिक्षा विभाग के नए आदेश ने अभिभावकों को असमंजस में डाल दिया है। विभाग ने सीबीएसई के आदेश की नकल करते हुए 11वीं-12वीं पर निर्णय लिया, लेकिन 8वीं तक की कक्षाओं पर फैसला टाल दिया।
HIGHLIGHTS
- शिक्षा विभाग ने 8वीं तक की कक्षाओं के संचालन पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं लिया।
- विभाग पर सीबीएसई के पुराने आदेश को 'कॉपी-पेस्ट' करने का आरोप लगा है।
- छात्रा अमायरा की आत्महत्या के बाद स्कूल की मान्यता और संचालन पर सवाल उठे थे।
- हाईकोर्ट पहले ही सीबीएसई के संशोधित आदेशों पर स्टे दे चुका है।
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शिक्षा विभाग पर 'कॉपी-पेस्ट' का आरोप
आरोप है कि विभाग ने केवल औपचारिकता निभाते हुए सीबीएसई के आदेश की 'कॉपी-पेस्ट' कर दी है। विभाग ने कक्षा 11 और 12 के संचालन को लेकर आदेश जारी किए हैं, जबकि सीबीएसई पहले ही इस पर संशोधित आदेश दे चुका है। हैरानी की बात यह है कि सीबीएसई के इन आदेशों पर हाईकोर्ट ने पहले ही स्टे लगा रखा है, फिर भी विभाग ने यही आदेश दोहराया।
अमायरा सुसाइड केस और स्कूल का विवाद
यह पूरा विवाद नीरजा मोदी स्कूल की कक्षा 4 की छात्रा अमायरा की आत्महत्या के बाद शुरू हुआ था। छात्रा ने स्कूल की छत से कूदकर जान दे दी थी, जिसके बाद स्कूल प्रबंधन और उसकी मान्यता पर गंभीर सवाल उठे थे। सीबीएसई ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि आठवीं तक की कक्षाओं के संचालन का निर्णय राज्य के शिक्षा विभाग को लेना है।
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अभिभावकों में बढ़ता आक्रोश
विभाग के इस टालमटोल वाले रवैये से अभिभावकों में गहरा रोष है। वे बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा को लेकर चिंतित हैं। शिक्षा विभाग ने आठवीं तक की कक्षाओं पर फैसला टालकर एक बार फिर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की है। इस अस्पष्ट आदेश के बाद अब आगामी सत्र में बच्चों के प्रवेश और स्कूल की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा विभाग को इस गंभीर मामले में पारदर्शिता के साथ ठोस निर्णय लेना चाहिए था।
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