Highlights
- 1857 की क्रांति के दौरान अजमेर के टॉडगढ़ किले पर हमला कर क्रांतिकारियों को मुक्त कराया।
- अंग्रेज अधिकारी कैप्टन कोनोली को बंदी बनाकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था।
- 1882 में अंग्रेजों ने धोखे से पकड़कर एनफील्ड बंदूक की गोलियों से उन्हें शहीद कर दिया।
- आज सिरोही, जालोर और पाली क्षेत्र में 'दाता' के रूप में पूजे जाते हैं सादुलसिंहजी।
सिरोही | राजस्थान की वीर प्रसूता धरा ने समय-समय पर ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने न केवल अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए तलवार उठाई, बल्कि अपने बलिदान से जन-मानस के हृदय में लोकदेवता के रूप में स्थान बनाया।
इन्ही में से एक गौरवशाली नाम है मंडवारिया के दाता सादुलसिंहजी देवड़ा का। सिरोही, जालोर और पाली जिलों के त्रिकोण में सादुलसिंहजी का नाम आज भी बड़े ही आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।
वे मात्र एक ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, बल्कि लाखों लोगों की आस्था के केंद्र और एक जागृत लोकदेवता हैं। उनका जीवन वीरता, संघर्ष और अटूट राष्ट्रभक्ति की एक ऐसी मिसाल है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।
1857 की क्रांति के गुमनाम नायक
इतिहास के पन्नों को पलटें तो दाता सादुलसिंहजी का व्यक्तित्व 1857 की पहली स्वतंत्रता क्रांति के दौरान एक प्रखर विद्रोही के रूप में उभरता है। पश्चिमी राजस्थान में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले वे प्रमुख योद्धा थे।
जिस प्रकार मारवाड़ में आउवा के ठाकुर खुशाल सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं, ठीक उसी प्रकार सिरोही और आसपास के क्षेत्रों में सादुलसिंहजी देवड़ा अंग्रेजों के लिए खौफ का पर्याय बन गए थे।
राजनीतिक दस्तावेजों और स्थानीय इतिहास के अनुसार, सादुलसिंहजी ने कभी भी विदेशी शासन की अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका मानना था कि मातृभूमि पर केवल उसके पुत्रों का अधिकार होना चाहिए, न कि सात समंदर पार से आए व्यापारियों का।
टॉडगढ़ और नसीराबाद में पराक्रम
सादुलसिंहजी के साहसिक कारनामों की चर्चा आज भी लोकगीतों में मिलती है। उन्होंने अजमेर स्थित टॉडगढ़ किले पर एक जबरदस्त हमला किया था। यह हमला न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि इसका उद्देश्य वहां कैद भारतीय क्रांतिकारियों को मुक्त कराना था। सादुलसिंहजी अपनी योजना में सफल रहे और उन्होंने क्रांतिकारियों को छुड़ाकर अपने साथ मिला लिया।
इसके बाद वे रुके नहीं, बल्कि नसीराबाद छावनी पर भी हमला बोल दिया। उनके नेतृत्व में एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने भी विद्रोह का रास्ता चुना। उनकी वीरता का सबसे बड़ा प्रमाण तब मिला जब उन्होंने माउंट आबू के तत्कालीन कमांडिंग ऑफिसर 'कैप्टन कोनोली' को शिवगंज के एक बंगले में कैद कर लिया था। यह अंग्रेजों के मुंह पर एक करारा तमाचा था।
विश्वासघात और अमर बलिदान
कहते हैं कि वीरों को हराना मुश्किल होता है, लेकिन अपनों के विश्वासघात से वे अक्सर हार जाते हैं। सादुलसिंहजी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
अंग्रेजों ने उन्हें सीधे युद्ध में हराने के बजाय षड्यंत्र का सहारा लिया। 1882 के आसपास उन्हें धोखे से बंदी बना लिया गया।
इतिहास के स्रोत बताते हैं कि उन्हें सिरोही शहर से सारणेश्वर जी मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर एक पेड़ से बांध दिया गया था। अंग्रेजों की क्रूरता का आलम यह था कि उन्हें एनफील्ड बंदूक की गोलियों से छलनी कर दिया गया।
इस बलिदान के बाद तत्कालीन सत्ता ने उनकी जागीर 'रोवाड़ा' पर कब्जा कर लिया और उनके परिवार को भारी कष्ट झेलने पड़े। उनकी धर्मपत्नी को अपना अंतिम समय लकवा गांव में अत्यंत सादगी और संघर्ष के बीच बिताना पड़ा।
लोकदेवता 'दाता' के रूप में प्रतिष्ठा
सादुलसिंहजी के बलिदान ने उन्हें जन-जन का प्रिय बना दिया। वीरगति प्राप्त करने के बाद वे 'झुंझार' के रूप में पूजे जाने लगे। आज सिरोही, जालोर और पाली के लगभग हर गांव में उनका 'थान' (चबूतरा) बना हुआ है।
भक्त उन्हें प्यार से 'दाता' कहकर पुकारते हैं। लोगों का अटूट विश्वास है कि दाता सादुलसिंहजी आज भी अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें 'प्रत्यक्ष पर्चा' (चमत्कार) देते हैं।
रोवाड़ा की पुलिस चौकी के एक कमरे में आज भी उनकी विशेष पूजा होती है, जो उनकी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यता का जीवंत प्रमाण है। विशेष बात यह है कि वे केवल राजपूत समाज के ही नहीं, बल्कि 'छत्तीस कौम' यानी सभी समुदायों के आराध्य हैं।
मंडवारिया में आस्था का भव्य केंद्र, सामाजिक समरसता का प्रतीक बना यह आयोजन
हाल ही में सिरोही के मंडवारिया गांव में सादुलसिंहजी देवड़ा का एक विशाल और नयनाभिराम मंदिर बनकर तैयार हुआ है। यह मंदिर उनकी बढ़ती लोकप्रियता और जन-आस्था का प्रतीक है।
11 फरवरी 2026 को इस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर आकाश से हेलीकॉप्टर द्वारा पुष्प वर्षा की गई, जिसे देखकर हर श्रद्धालु भावविभोर हो उठा।
सामाजिक समरसता का प्रतीक बना यह आयोजन. इस मंदिर का निर्माण भंवर सिंह देवड़ा के परिवार (श्रवण सिंह और नरेंद्र सिंह) द्वारा कराया गया है, लेकिन इसे पूरे समाज और क्षेत्र की धरोहर माना जाता है।
संतों का सानिध्य और संस्कारों की सीख
मंडवारिया मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में जूना अखाड़ा के अंतर्राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री महंत नारायण गिरी जी महाराज सहित कई बड़े संतों ने शिरकत की।
संतों ने अपने संबोधन में कहा कि सादुलसिंहजी का जीवन केवल युद्ध लड़ने तक सीमित नहीं था, बल्कि वे धर्म और संस्कारों के रक्षक थे। यह मंदिर केवल पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए वीरता और भक्ति का पाठशाला है।
आज के समय में जब युवा अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं, तब दाता सादुलसिंहजी जैसे महापुरुषों की गाथाएं उन्हें अपनी संस्कृति और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों की याद दिलाती हैं।
सादुलसिंहजी देवड़ा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि जो लोग राष्ट्र और धर्म के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं, वे मृत्यु के बाद भी मरते नहीं, बल्कि लोक-आस्था के रूप में अमर हो जाते हैं। आज मंडवारिया का यह मंदिर और वहां गूंजते 'दाता' के जयकारे उनकी अमरता की गवाही दे रहे हैं।
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