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मीरा इतनी सस्ती नहीं, ना ही ऐसी साधना आसान।

नीलू शेखावत नीलू शेखावत 28

लोग हमसे भी अपने विचार रखने को कह रहे हैं। उन्हें अपेक्षा है कि मैं 'आधुनिक मीरा' शीर्षक से बहुत बड़ा लेख लिखूंगी। 'अहो' 'अनुपम' 'धन्य-धन्य' जैसे शब्दों से लेख को 'ओट' दूंगी और शास्त्रों के उद्धरण दे देकर उसे संस्कारित बना दूंगी। तो ऐसे अपेक्षकों से अग्रिम मुआफी।

HIGHLIGHTS

  1. 1 उनको उकसाओ मत। (बॉस को सबाव कोनी जाणो?)
  2. 2 कहीं ऐसा न हो कि आपका भगतपना किसी लड़की का जीना दुश्वार कर दे
  3. 3 ईश्वर-प्रेम की गली बड़ी संकरी है इसमें जगत और जगदीश दोनों एक साथ नहीं समाते।
  4. 4 कोई न कोई 'भोळी डाळी' कन्या मिल ही जायेगी। किन्तु यदि यहीं पर बैठे-बैठे पंचायती करते रहोगे तो व्यवस्था सुधरे न सुधरे ,तुम 'लखणों के लाडे' 'अखन कुंवारे' रह जाओगे।
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मीरा इतनी सस्ती नहीं

प्रसंगवश | कल से एक ही फोटू,वीडियो और अखबार की कटिंग बायरल पे बायरल हुई जा रही है।

लोग हमसे भी अपने विचार रखने को कह रहे हैं। उन्हें अपेक्षा है कि मैं 'आधुनिक मीरा' शीर्षक से बहुत बड़ा लेख लिखूंगी। 'अहो' 'अनुपम' 'धन्य-धन्य' जैसे शब्दों से लेख को 'ओट' दूंगी और शास्त्रों के उद्धरण दे देकर उसे संस्कारित बना दूंगी। तो ऐसे अपेक्षकों से अग्रिम मुआफी।

संक्षिप्त और सीधी बात यह है कि सबका अपना-अपना जीवन है और उसे अपने तरीके से जीने की स्वतंत्रता भी, फिर चाहे वह पुरुष हो या स्त्री।

इससे आगे रत्ती भर भी किसी तरह का कमेंट करने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी और कोई भी विवेकशील व्यक्ति शायद यही करेगा लेकिन अचानक यह घटना 'विमर्श' में परिवर्तित हो गई। खेमे बन गए, पक्ष और विपक्ष में। जिस जगह दो खेमें बनते हैं वहां पंचायती करने वालों का 'बक' लग ही जाता है।

खेमा नंबर एक में पुरुष अपेक्षाकृत अधिक हैं,सर्वथा अधिक कह दूं तो भी गलत न होगा क्योंकि पंचायती में स्त्री को शामिल किया ही कब जाता है। फिर सोशल मीडिया पर तो स्त्रियां सिर्फ रील, सस्ती शायरी और फिल्टर वाले फोटू चिपकाने ही आतीं हैं,उन्हें पंचायती से क्या लेना?

तो ग्रुप बना-बनाकर पुरुषों ने चिंता जाहिर की कि-"घोर कलियुग है,सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने का षड्यंत्र है।"

"पुरुषों की गैर हाजिरी में स्त्रियां विवाह रचा रही हैं। समाज को समय रहते इस खतरे की घंटी को भांप लेना चाइए अन्यथा परिणाम शुभ नहीं।"

किसी तीसरे ने लिखा- "ऐसी नचनियों पर समाज को समय रहते लगाम लगानी होगी जो धर्म की ओट लेकर अपनी कुत्सित मनोवृत्ति को बढ़ा रही हैं।"

किसीने लिखा- "कैसी मीरां? मीरां तो स्वयं विवाहिता थीं।उन्होंने विवाह जैसी पवित्र संस्था को कभी नहीं नकारा।"

यह अंतिम पंक्ति मेरे दिल को लग गई। मैंने उस ग्रुप के कुछ योद्धाओं की प्रोफाइल चेक की।अधिकांश फुल टाइम फ्री लोग, फोटूओ से बीस से चालीस की उम्र के बीच के लगे। मुफ्त का ज्ञानोपदेश निठल्लों के ही हिस्से आया। ऐसे निठल्लों से मेरा कहना है-

हे निखट्टूओं! तुम विवाह व्यवस्था की चिंता न करो। कुछ ढंग की पढ़ाई-लिखाई कर लो,सोशल मीडिया का आधा टाइम भी किताबों को दे दो तो, तुम्हारे विवाह में कोई कमी न रहेगी।

कोई न कोई 'भोळी डाळी' कन्या मिल ही जायेगी। किन्तु यदि यहीं पर बैठे-बैठे पंचायती करते रहोगे तो व्यवस्था सुधरे न सुधरे ,तुम 'लखणों के लाडे' 'अखन कुंवारे' रह जाओगे।

फिर तुम्हें चिंता ही करनी है तो अपनी नसल की करो। चिंता करो कि क्यों तुम लड़की देखी नहीं कि इनबॉक्स में लार टपकाने पहुंच जाते हो, काहे किसी लड़की के इंस्टाग्राम पर धूळ खाने जाते हो। हे बिना नाथ के नारों! लड़कियां तुमसे सो गुना सही व्यवस्था में है, उनको उकसाओ मत। (बॉस को सबाव कोनी जाणो?)

अब खेमा नंबर दो जिसके भोले भगत पक्षकारों का कहना है- "धन्य है वे मात पिता जिन्होंने ऐसी पुत्री को धरती पर जन्म दिया। ठाकुर जी का वरण करने वाली कन्या साधारण नहीं,अलौकिक है। धन्य है वह कुल जिसमें एक बार फिर मीरा अवतरित हुई।"

ये बेचारे मीडिया की बातों में आ गए। मीडिया का फंडा अलग ही है। इसके कैमरे का फ्लैश हमेशा चमकती चीजों पर ही पड़ता है। एक तो खूबसूरत मॉडल ऊपर से पिता साथ नहीं तो फेमिनिज्म का तड़का लग गया, मीरा सबके लिए मुफ्त की मिसाल है ही।

भोले भक्तों! मैं यह नहीं कहती कि आज के युग में मीरा होना अकल्पनीय है क्योंकि कई पुण्यात्मा युवतियां उस श्रेय मार्ग का अब भी वरण करती हैं और दृढ़ता से निभाती भी हैं किंतु उन्हें आप कभी इस तरह सिर पर नहीं उठाओगे क्योंकि वे 'तुम्हारी मीरा की परिभाषा' में कभी फिट नहीं बैठेंगी।

ईश्वर-प्रेम की गली बड़ी संकरी है इसमें जगत और जगदीश दोनों एक साथ नहीं समाते। जिन्होंने जगदीश से लगन लगा ली उनके लिए देह परमात्म भक्ति का निमित मात्र है। उनकी सादगी और संयम पर तुम्हारा कैमरा भूल से भी नहीं जा सकता।

न उन्हें तुम्हारी वाह-वाही की जरूरत है क्योंकि उन्होंने जो पाया है- वह 'राम रतन धन' तुम्हारी समझ के आस पास भी नहीं।

यत् पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥
(जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं, उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है।अष्टावक्र गीता ४- २)

मीरा इतनी सस्ती नहीं, ना ही ऐसी साधना आसान।

वैसे कहा यह भी जा रहा है कि युवती ने यह विवाह मांगलिक दोष निवारणार्थ किया है। हालांकि मीडिया की कहानी कुछ और ही कहती है। जो भी हो, समझदार लोग बिना विचारे ऐसे मुद्दे ना ही उछाले तो बेहतर है।

कहीं ऐसा न हो कि आपका भगतपना किसी लड़की का जीना दुश्वार कर दे। बस इतना ही कहना था।

बाकि हम आजाद मुल्क के वाशिंदे हैं, सबको अपनी आजादी मुबारक।

नीलू शेखावत

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