इससे ठीक पहले 29 नवंबर 2025 को सुशीला ने एक बच्चे को जन्म दिया। उन्होंने उसी दिन विभाग को अपनी स्थिति बताते हुए फिजिकल टेस्ट की तारीख आगे बढ़ाने की मांग की थी।
मजबूरी में दौड़ में हुई शामिल
विभाग की तरफ से सुशीला को कोई जवाब नहीं मिला। इस डर से कि कहीं वह भर्ती प्रक्रिया से बाहर न हो जाए, सुशीला डिलीवरी के महज 15 दिन बाद 14 दिसंबर को ग्राउंड पर पहुंची।
उन्होंने दौड़ में हिस्सा लिया, लेकिन शारीरिक कमजोरी के कारण वह दौड़ पूरी नहीं कर सकीं। इसके परिणामस्वरूप उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।
नियमों में है छूट का प्रावधान
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में विज्ञापन की शर्त संख्या 10 का हवाला दिया। इस शर्त में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि गर्भवती महिलाओं को दौड़ में हिस्सा न लेने की सलाह दी जाती है।
उन्हें फिजिकल टेस्ट के दिन उपस्थित होकर बोर्ड को प्रार्थना पत्र देना होता है। डिलीवरी के बाद अधिकतम 6 महीने की अवधि में मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट देने पर उनका टेस्ट बाद में लिया जा सकता है।
कोर्ट ने समझी महिला की मजबूरी
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने समय पर विभाग को सूचना दे दी थी। चूंकि उसे कोई छूट नहीं मिली, इसलिए वह मजबूरी में दौड़ में शामिल हुई।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "याचिकाकर्ता की मेडिकल और शारीरिक स्थिति, डिलीवरी की तारीख और फिजिकल टेस्ट की तारीख को देखते हुए, यह कोर्ट का मत है।"
"उसे विज्ञापन की शर्तों के तहत छूट देते हुए एक और मौका दिया जाना चाहिए।"
छह महीने में फिटनेस सर्टिफिकेट
कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता के मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करें।
उन्हें 6 महीने के भीतर राजकीय चिकित्सा अधिकारी से फिटनेस सर्टिफिकेट पेश करने पर भविष्य में होने वाले फिजिकल टेस्ट में शामिल होने का मौका दिया जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक सुशीला को यह मौका नहीं मिल जाता, तब तक कॉन्स्टेबल-ड्राइवर महिला (बाड़मेर) का एक पद रिक्त रखा जाए।