संवत चउदेसाल, बरस बरासी बखाने।
बेशाख सुद दूज ,जको गुरुवार ही जाने।।
श्रीनृप चढे शिकार ,धरा पश्चिम जण धरियो।
शांचाने खरगोश, फालदे पाछो फरियो।।
शुरमी जगह जान,सुधर खरे नेम वेला खरि।
सहस्रमल राव शोभा तने ,सिरोही थापन करी ।।,,
उल्लेखनीय है कि शाकंभरी साम्राज्य के शासक वाकपतिराज प्रथम के कुमार लाखन( लक्ष्मण) द्वारा लगभग 943 ई के आसपास सप्तशतभूमि नाडोल में राज्य स्थापित किया गया था। इसी राजवंश में नाडोल के शासक केल्हन के कुमार कीर्तिपाल चौहान ने सन 1181 ईस्वी में जालंधर (जालौर) पर अपना अधिकार कायम किया था । जालौर के शासक समरसिंह के राजकुमार मानिंगराय ( मानवसिंह , मानसिंह) ने सन 1206 ईस्वी में बरलूट में अपनी पृथक राजधानी स्थापित की थी, जिसे सिरोही राज्य की प्रथम राजधानी भी कहा जा सकता है। उनके पुत्र महाराव प्रतापमल उर्फ देवराज के वंशज देवड़ा चौहान कहलाए।

देवराज के उत्तराधिकारी महाराव विजयराज देवड़ा (बिजलराय )द्वारा सन 1283 ईस्वी में मंडार एवं लगभग 1297 ई के आसपास सिरनवा पहाड़ की दुर्गम पहाड़ियों में बिजलपुर में अस्थाई राजधानी होने के संकेत पाए जाते हैं । इसी क्रम में 1307 ईस्वी में महाराव विजयराज् देवड़ा द्वारा पश्चिमी भारत की महानगरी चंद्रावती पर अधिकार करने एवं सन 1311 ईस्वी में उनके राजकुमार लुंभकरण देवड़ा उर्फ लुम्भा देवड़ा द्वारा आबू विजय करने का उल्लेख पाया जाता है।
सिरोही स्थापना से पूर्व आबू चंद्रावती में सन 1395 ई तक देवड़ा चौहानों की राजधानी रही। तदुपरांत 10 वर्षों तक देवड़ा चौहानों की राजधानी प्राचीन अमरीशपुरी (आबू की तलहटी में स्थित वर्तमान उमरनी के निकट) में होने के संकेत भी मिलते हैं ।
ऐतिहासिक व्रतांत अनुसार सन 1405 ईस्वी में महाराव शिवभान देवड़ा द्वारा वर्तमान सिरोही नगर से एक मील पूर्व की ओर सिरणवा पहाड़ियों के अर्ध चंद्राकर भाग में शिवपुरी (प्राचीन ,खोबो की सिरोही ) नामक राजधानी की स्थापना की गई थी। उनके उत्तराधिकारी महाराव सहस्रमल देवड़ा ने सन 1425 ईस्वी में शिकार के इस चमत्कारिक दृश्य से प्रभावित होकर वैशाख शुक्ला द्वितीया संवत 1482 को वर्तमान सिरोही नगर राजधानी की स्थापना की थी, जिसे लगभग 524 वर्षों तक सिरोही राज्य की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।
सिरोही राज्य के इस नगर राजधानी की स्थापना के काल से ही यहां के शासकों ने गोरवशाली इतिहास, संस्कृति, स्वतन्त्रता संघर्ष के कीर्तिमानों के साथ ही जल संरक्षण एवं पर्यावरण सुरक्षा की अद्भुत मिसाल भी कायम रखी है। यहां के भूमिगत जल संरक्षण की अद्भुत व्यवस्था वर्तमान के वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का प्राचीन प्रेरणा स्रोत उदाहरण कहा जा सकता है ।
सिरोही में पेयजल प्रणाली की सुंदरता में चार चांद लगाती दर्जनों बावड़िया, सजीवता लिए जल सरोवर , घने जंगल , ओरण एवं वन भूमि का संरक्षण , आखेट निषेध क्षेत्र आदि ऐसे प्रेरणादायक उद्धरण है, जो सचमुच ही जल जीवन ,पर्यावरण संरक्षण एवं जीव दया का जीता जागता संदेश देते प्रतीत होते हैं । सिरोही की धरती इतिहास, संस्कृति एवम् पुरातत्व की त्रिवेणी संगम है। सिरोही नगर राजधानी की स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।
डॉक्टर उदयसिंह डिंगार, प्रांत उपाध्यक्ष ,भारतीय इतिहास संकलन समिति मरू प्रान्त।
