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ज़िंदगानी

महाभारत की कास्टिंग में पंकज धीर के इंकार की दिलचस्प दास्तान

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interesting story of pankaj dheers refusal in casting of mahabharata

Bollywood | “निकलो यहां से। वो रहा दरवाज़ा। बाहर जाओ। और कभी यहां दोबारा मत आना।” इन कठोर शब्दों के साथ बी.आर. चोपड़ा ने पंकज धीर को अपने ऑफिस से बाहर कर दिया। वजह थी महाभारत के अर्जुन का किरदार निभाने से उनका इंकार करना। इस पूरे किस्से में गुस्सा, नाराजगी और आखिरकार माफ़ी का दिलचस्प सिलसिला छुपा है।

पंकज धीर को पहले अर्जुन के किरदार के लिए चुना गया था। उन्होंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भी बताया कि वे अर्जुन बनकर महाभारत में आने वाले हैं। लगभग दो महीने इसी उत्साह में बीते, लेकिन जब तीसरे महीने बी.आर. चोपड़ा ने उन्हें मूंछें काटने की शर्त रखी, तो पंकज ने इसे मानने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि उनके चेहरे का संतुलन खराब लगेगा। बी.आर. चोपड़ा इस जवाब से नाराज़ हो गए और पंकज धीर को ऑफिस से बाहर निकाल दिया।

कुछ महीने बाद बी.आर. चोपड़ा ने फिर से पंकज धीर को अपने ऑफिस बुलाया और पूछा, “कर्ण का रोल करोगे?” यह सुनकर पंकज ने फौरन पूछा कि क्या उन्हें मूंछें कटवानी होंगी। इस बार चोपड़ा साहब ने साफ कहा कि नहीं। पंकज धीर ने खुशी-खुशी इस रोल को स्वीकार कर लिया, और इस तरह भारतीय टेलीविजन के इतिहास में अमर होने वाला "कर्ण" का किरदार उनके हिस्से आ गया।

मुंबई में पले-बढ़े और अंग्रेजी माध्यम से पढ़े पंकज धीर के लिए संस्कृत और हिंदी ग्रंथों की भाषा एक चुनौती थी। राही मासूम रज़ा ने उन्हें "नवभारत टाइम्स" को जोर-जोर से पढ़ने का सुझाव दिया ताकि वे हिंदी में सहज हो सकें। उन्होंने रामधारी सिंह दिनकर की "रश्मिरथी" और शिवाजी सावंत की "मृत्युंजय" भी पढ़ी। इस तैयारी ने उन्हें कर्ण के किरदार को और गहराई से समझने में मदद की।

महाभारत के कर्ण को निभाते हुए पंकज धीर ने कभी भी पलकें नहीं झपकाईं। उनका मानना था कि सूतपुत्र कर्ण की तरह, जो राजा-महाराजाओं के बीच हर समय चौकन्ना रहता था, वे भी हर दृश्य में चौकस रहना चाहिए। इसी तरह, उन्होंने कर्ण के संवादों को धीमे, सधे हुए स्वर में बोला, जबकि दुर्योधन और शकुनि जैसे किरदार ऊंची आवाज़ में बोलते थे। इस संतुलन ने कर्ण के किरदार को खास बना दिया।

महाभारत में कर्ण की मृत्यु वाला एपिसोड दर्शकों के दिलों में घर कर गया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने चोपड़ा साहब से पंकज धीर को आदिवासियों से मिलवाने की इच्छा जताई। पंकज धीर जब बस्तर पहुंचे, तो हजारों आदिवासियों ने उन्हें देखकर सिर झुकाया, और यह देख पंकज धीर भावुक हो गए। वहां के आदिवासियों ने कर्ण के प्रति अपनी श्रद्धा में सिर मुंडवा लिया था।

महाभारत के दौर में एक पॉप्युलैरिटी पोल के अनुसार, राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन के बाद तीसरे स्थान पर पंकज धीर थे। छोटे गांवों में भी लोग उन्हें “कर्ण” के नाम से ही जानते थे। महाभारत के कर्ण ने उन्हें इतनी प्रसिद्धि दिलाई कि लोग असल जिंदगी में भी उन्हें कर्ण समझने लगे।

9 नवंबर 1959 को जन्मे पंकज धीर आज 65 वर्ष के हो चुके हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि अर्जुन का किरदार ठुकराना उनकी एक बड़ी गलती थी। समय के साथ उन्होंने सीखा कि एक अभिनेता को हर चुनौती के लिए तैयार रहना चाहिए।

पंकज धीर ने कर्ण के किरदार में जो समर्पण और गहराई दिखाई, वह आज भी भारतीय टेलीविजन का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। महाभारत का उनका यह किरदार दर्शकों के दिलों में आज भी जीवित है।

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