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जालोर

जालोर में RSS शताब्दी वर्ष पर हिंदू सम्मेलन: मिट्टी से बना स्वर्णगिरि दुर्ग और शोभायात्रा में गूंजे भारत माता के जयकारे

ललित पथमेड़ा ललित पथमेड़ा 60

जालोर में RSS के शताब्दी वर्ष पर भव्य हिंदू सम्मेलन आयोजित हुआ। शोभायात्रा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मिट्टी से बने स्वर्णगिरि दुर्ग ने सबका मन मोह लिया।

HIGHLIGHTS

  1. 1 RSS शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में जालोर में भव्य आयोजन, मिट्टी से बनाया गया जालोर का प्रसिद्ध स्वर्णगिरि दुर्ग, राजस्थानी वेशभूषा में निकली शोभायात्रा और गूंजे जयकारे।
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मिट्टी का स्वर्णगिरि दुर्ग बना आकर्षण

जालोर | राजस्थान के जालोर शहर में रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में एक भव्य हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। शहर के तीन प्रमुख स्थानों पर एक साथ आयोजित इस कार्यक्रम ने पूरे क्षेत्र को उत्सव के रंग में सराबोर कर दिया।

इस विशेष अवसर पर शहर की गौडिजी बस्ती, रामदेव कॉलोनी और हनुमान बस्ती में हिंदू सम्मेलन के दौरान भव्य शोभायात्राएं निकाली गईं। इन यात्राओं में शामिल श्रद्धालु पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में नजर आए, जो राजस्थान की समृद्ध संस्कृति का परिचय दे रहे थे।

मिट्टी से बना स्वर्णगिरि दुर्ग रहा आकर्षण का केंद्र

कार्यक्रम का सबसे अनूठा हिस्सा हनुमान शाला स्कूल में देखने को मिला, जहां कलाकारों ने मिट्टी से जालोर के ऐतिहासिक स्वर्णगिरि दुर्ग की एक सुंदर प्रतिकृति तैयार की थी। यह मिट्टी का किला वहां मौजूद लोगों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र बना रहा और हर कोई इस कलाकृति की सराहना करता नजर आया।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों और जयकारों की गूंज

शोभायात्रा के दौरान डीजे पर बजते देशभक्ति गीतों और 'भारत माता की जय' के जयकारों ने लोगों में जोश भर दिया। हनुमान शाला स्कूल में आयोजित कार्यक्रम में महिलाओं ने पारंपरिक घूमर नृत्य की प्रस्तुति दी, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद आयोजित धर्मसभा में विभिन्न संतों और वक्ताओं ने समाज को संबोधित किया।

  • RSS शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में तीन जगह हुए आयोजन।
  • पारंपरिक वेशभूषा में सजे पुरुष और महिलाओं ने निकाली शोभायात्रा।
  • भैरूनाथ अखाड़े के ईश्वर नाथ महाराज के सानिध्य में हुई धर्मसभा।
  • सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से एकता का संदेश दिया गया।

जालोर की सड़कों पर उमड़ा यह जनसैलाब न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक था, बल्कि यह सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक गौरव को भी दर्शाता है। संतों ने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति और मूल्यों को संजोने पर जोर दिया।

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