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ज़िंदगानी

जोधपुर में राव अचलदास जी खींची जयंती पर साका स्मरण, शक्ति सिंह बांदीकुई ने की शिरकत

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जोधपुर (Jodhpur) में राव अचलदास जी खींची (Rao Achaldas Ji Khinchi) जयंती पर गागरोंन गढ़ (Gagron Fort) के साका (Saka) का स्मरण हुआ। नई पीढ़ी को शौर्यगाथाएं बताई गईं।

HIGHLIGHTS

  1. 1 जोधपुर में राव अचलदास जी खींची की जयंती पर विशेष कार्यक्रम आयोजित। गागरोंन गढ़ के ऐतिहासिक साका का स्मरण कर नई पीढ़ी को शौर्यगाथाएं बताई गईं। यूनाइटेड ग्लोबल पीस फाउण्डेशन के निदेशक शक्ति सिंह बांदीकुई ने कार्यक्रम में शिरकत की। चौहान वंश के बलिदान और संत पीपा जी महाराज के आदर्श चरित्र पर प्रकाश डाला गया।
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Shakti Singh Bandikui in Jodhpur

जोधपुर, राजस्थान। यूनाइटेड ग्लोबल पीस फाउण्डेशन (United Global Peace Foundation) के निदेशक शक्ति सिंह बांदीकुई (Shakti Singh Bandikui) ने हाल ही में जोधपुर (Jodhpur) के इंद्रोखा (Indrokha) में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लिया। यह कार्यक्रम वीरवार राव अचलदास जी खींची (Rao Achaldas Ji Khinchi) की जयंती के अवसर पर गागरोंन गढ़ (Gagron Fort) में हुए ऐतिहासिक साका (Saka) को स्मरण करने के लिए आयोजित किया गया था। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को राजस्थान के गौरवशाली इतिहास और वीर शौर्यगाथाओं से परिचित कराना था।

बांदीकुई ने इस अवसर पर आयोजकों को साधुवाद दिया, जिन्होंने पराक्रम और बलिदान की उस महान परंपरा को याद करने का सराहनीय कार्य किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन हमारी युवा पीढ़ी के लिए एक सेतु का काम करते हैं, जो उन्हें अपने पूर्वजों के अदम्य साहस और त्याग से प्रेरणा लेने का अवसर प्रदान करते हैं।

राजस्थान की धरती सदियों से साकाओं की गाथाओं से रंजित रही है, और इनमें सर्वाधिक साका वीर चौहान वंश (Chauhan Dynasty) ने किए हैं। यह वंश न केवल रणभूमि में अपने असंख्य बलिदानों के लिए जाना जाता है, बल्कि इसने भक्ति और अध्यात्म की परंपरा को भी समाज को समर्पित किया है। इसी महान परंपरा में राव प्रताप सिंह जी (Rao Pratap Singh Ji) का नाम भी आता है, जो आगे चलकर संत पीपा जी महाराज (Sant Pipa Ji Maharaj) के नाम से विख्यात हुए। उनका आदर्श चरित्र आज भी समाज के लिए एक मार्गदर्शक बना हुआ है।

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यह कार्यक्रम इस बात का प्रतीक था कि कैसे एक ओर चौहान वंश ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, वहीं दूसरी ओर भक्ति और अध्यात्म के माध्यम से समाज को नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का पाठ पढ़ाया। ऐसे आयोजनों से न केवल इतिहास का स्मरण होता है, बल्कि यह वर्तमान पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत पर गर्व करने तथा उससे प्रेरणा लेने के लिए भी प्रेरित करता है।

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