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सिरोही और माउंट आबू के आयुक्त आशुतोष आचार्य पर हाई कोर्ट का बड़ा एक्शन, नियुक्ति के आदेशों पर लगाई रोक

गणपत सिंह मांडोली गणपत सिंह मांडोली 112

राजस्थान हाई कोर्ट ने सिरोही और माउंट आबू के कार्यवाहक आयुक्त आशुतोष आचार्य की नियुक्तियों पर रोक लगा दी है। पूर्व पार्षद भरत धवल की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने डीएलबी और जिला कलेक्टर के आदेशों को स्टे कर दिया है, जिसके बाद आचार्य अगले छह सप्ताह तक कार्य नहीं कर सकेंगे।

HIGHLIGHTS

  1. 1 राजस्थान हाई कोर्ट ने सिरोही और माउंट आबू आयुक्त के नियुक्ति आदेशों पर स्थगनादेश दिया। न्यायाधीश संजीत पुरोहित ने पूर्व पार्षद भरत धवल की याचिका पर सुनाया यह अहम फैसला। अगले छह सप्ताह तक आशुतोष आचार्य इन महत्वपूर्ण पदों पर कार्यभार नहीं संभाल सकेंगे। नियमों के उल्लंघन और पुराने कानूनी दृष्टांतों को आधार बनाकर नियुक्ति को दी गई थी चुनौती।
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सिरोही | राजस्थान की राजनीति में प्रशासनिक अधिकारियों का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक मोहरे के रूप में होता रहा है, लेकिन जब कानून का डंडा चलता है तो बड़े-बड़े आदेश धरे रह जाते हैं। ऐसा ही एक मामला सिरोही और माउंट आबू में देखने को मिला है, जहां कार्यवाहक आयुक्त आशुतोष आचार्य की नियुक्ति को राजस्थान हाई कोर्ट ने पूरी तरह से स्टे कर दिया है। सिरोही नगर परिषद के पूर्व पार्षद भरत धवल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायालय ने यह कड़ा रुख अपनाया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस आदेश के बाद आचार्य अगले छह सप्ताह तक दोनों ही महत्वपूर्ण पदों पर किसी भी प्रकार का कार्य नहीं कर पाएंगे।

हाई कोर्ट ने किन आदेशों पर लगाई रोक?

मामले की गहराई में जाएं तो जिला कलेक्टर ने 24 नवंबर 2025 को एक आदेश जारी कर आशुतोष आचार्य को सिरोही का कार्यवाहक आयुक्त नियुक्त किया था। इसके तुरंत बाद, स्वायत्त शासन विभाग (DLB) के शासन सचिव एवं आयुक्त रवि जैन ने 26 फरवरी 2026 को एक और आदेश जारी कर उन्हें माउंट आबू नगर पालिका का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंप दिया। राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधीश संजीत पुरोहित ने इन दोनों ही आदेशों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता निशांत बापना ने दलील दी कि 'राजस्थान सबोर्डिनेट ऑफिसेस मिनिस्ट्रियल सर्विस रूल' के तहत नियुक्त किसी भी कार्मिक को आयुक्त या अधिशासी अधिकारी जैसे उच्च पदों का अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया जा सकता।

विवादों से पुराना नाता और भ्रष्टाचार के आरोप

आशुतोष आचार्य का प्रशासनिक करियर विवादों से घिरा रहा है। माउंट आबू में चर्चित लिंबडी कोठी के अवैध निर्माण के दौरान वह लंबे समय तक वहां तैनात रहे और उन पर कांग्रेस नेता बद्रीराम जाखड़ के करीबी होने के आरोप लगे। वहीं, भाजपा शासन के दौरान वह सिरोही नगर परिषद में राजस्व अधिकारी के रूप में आए और बाद में शिवगंज के अधिशासी अधिकारी बने। शिवगंज में चुंगी नाके को रातों-रात ध्वस्त करने का मामला आज भी राजनीतिक गलियारों में गूंजता है, जिसे लेकर विधायक संयम लोढ़ा अक्सर तत्कालीन भाजपा सरकार और आचार्य को घेरते रहे हैं।

राजनीतिक समीकरण और भ्रष्टाचार के दाग

कांग्रेस ने आशुतोष आचार्य की नियुक्तियों को लेकर भाजपा पर हमेशा 'भ्रष्टाचार प्रेम' का आरोप लगाया है। भीनमाल में पट्टे जारी करने के बदले छह लाख रुपये की रिश्वत मांगने के मामले में जब कनिष्ठ लिपिक जगदीश कुमार ट्रैप हुआ था, तब तत्कालीन अधिशासी अधिकारी के रूप में आचार्य को भी नामजद किया गया था। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा अपने वोट बैंक को साधने के लिए विवादित और भ्रष्टाचार के मामलों में लिप्त अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रही है। अब हाई कोर्ट के इस स्थगनादेश ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को हिला दिया है, बल्कि जिले की राजनीति में भी नया उबाल ला दिया है। आगामी छह सप्ताह प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण होंगे क्योंकि न्यायालय ने संबंधित सभी पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

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