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सिरोही नगर परिषद भूमि घोटाला: संयम लोढ़ा ने करोड़ों के फर्जी पट्टे निरस्त करने की उठाई मांग, कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन

गणपत सिंह मांडोली गणपत सिंह मांडोली 155

सिरोही में नगर परिषद की बेशकीमती भूमि पर अवैध रूप से 69A के पट्टे जारी करने का बड़ा मामला सामने आया है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने जिला कलेक्टर से मिलकर अधिकारियों और भू-माफियाओं के बीच मिलीभगत का पर्दाफाश किया है।

HIGHLIGHTS

  1. 1 पूर्व मुख्यमंत्री सलाहकार संयम लोढ़ा ने सिरोही नगर परिषद की भूमि पर फर्जी पट्टे जारी करने का आरोप लगाया। खसरा संख्या 1298 और 1300 की करोड़ों की जमीन पर नियम विरुद्ध तरीके से 69A के तहत पट्टे जारी किए गए। उपखण्ड अधिकारी पर राजनीतिक दबाव में आकर और बिना नगर परिषद को सुने गलत आदेश पारित करने का आरोप। लोढ़ा ने पट्टा संख्या 11 से 37 को तत्काल निरस्त करने और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की।
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सिरोही | राजस्थान के सिरोही जिले में भ्रष्टाचार का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री सलाहकार और पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने सिरोही नगर परिषद की बेशकीमती भूमि पर अवैध रूप से पट्टे जारी करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। लोढ़ा ने इस संबंध में जिला कलेक्टर अल्पा चौधरी और नगर परिषद प्रशासक एवं अतिरिक्त जिला कलेक्टर राजेश गोयल से मुलाकात कर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन में नगर परिषद के अधिकारियों, कर्मचारियों और राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने का सनसनीखेज खुलासा किया गया है। लोढ़ा ने मांग की है कि भ्रष्टाचार के चलते अवैध रूप से जारी किए गए इन पट्टों को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।

करोड़ों की भूमि पर भ्रष्टाचार का साया

संयम लोढ़ा ने बताया कि सिरोही नगर परिषद के स्वामित्व वाली भूमि, जो मौजा ग्राम सिरोही प्रथम में स्थित है, उस पर भारी भ्रष्टाचार किया गया है। उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि पुराने खसरा संख्या 1076/1 मी और नए खसरा संख्या 1298 (रकबा 0.0300 हेक्टेयर) तथा पुराने खसरा संख्या 1075 और नए खसरा संख्या 1300 (रकबा 0.1700 हेक्टेयर) जो कि 'ग़ैर मुमकिन आबादी' के रूप में दर्ज हैं, उन पर अवैध कब्जा कराने की कोशिश की गई है। विशेष रूप से खसरा संख्या 1298, जो आधिकारिक तौर पर सड़क के रूप में दर्ज है, उसे भी निजी व्यक्तियों के नाम करने का प्रयास किया गया है। लोढ़ा ने स्पष्ट किया कि यह पूरी भूमि नगर परिषद सिरोही के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है, फिर भी अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर धारा 69A के तहत फर्जी पट्टे जारी कर दिए।

धारा 69A का दुरुपयोग और मिलीभगत

लोढ़ा ने अपने ज्ञापन में विस्तार से बताया कि किस प्रकार नगर परिषद सिरोही के आयुक्त और अन्य कर्मचारियों ने मिलीभगत करके करोड़ों रुपये की संपत्ति का बंदरबांट किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सड़क और आबादी भूमि, जो परिषद की स्वयं की संपत्ति है, उसे फर्जी और विधि विरुद्ध तरीके से निजी व्यक्तियों के नाम स्थानांतरित कर दिया गया। धारा 69A के तहत पट्टा जारी करने की एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया होती है, लेकिन इस मामले में उस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। लोढ़ा के अनुसार, यह सीधे तौर पर राजकोष को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाने वाला कृत्य है। यह संपत्ति सिरोही से शिवगंज मुख्य रोड पर स्थित है, जिसकी बाज़ार दर अत्यंत उच्च है। जय सिंह और अन्य व्यक्तियों को बेचान इकरार के आधार पर पट्टे जारी करना घोर अनियमितता की श्रेणी में आता है।

उपखण्ड अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल

इस पूरे प्रकरण में उपखण्ड अधिकारी (SDM) हरि सिंह देवल की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। लोढ़ा ने बताया कि जय सिंह नामक व्यक्ति ने धारा 136 भू-राजस्व अधिनियम के तहत रिकॉर्ड शुद्धीकरण हेतु प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया था। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि राजस्व रिकॉर्ड में जय सिंह के नाम से कोई कृषि भूमि दर्ज ही नहीं थी। इसके बावजूद, नगर परिषद सिरोही को इस मामले में पक्षकार बनाए बिना और उसे सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना, राजनीतिक दबाव में आकर 10 जनवरी 2025 को एक गलत निर्णय पारित कर दिया गया। लोढ़ा ने तर्क दिया कि जब भूमि नगर परिषद के नाम दर्ज थी, तो परिषद को सूचना दिए बिना कोई भी आदेश पारित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

दस्तावेजों में हेराफेरी और फर्जीवाड़ा

ज्ञापन में लोढ़ा ने कानूनी पहलुओं को उजागर करते हुए बताया कि 10 जनवरी 2025 के निर्णय में न्यायालय ने स्वयं माना था कि प्रार्थी जय सिंह की खातेदारी या स्वामित्व की पुष्टि नहीं होती है, फिर भी केवल 'त्रुटि सुधार' के नाम पर आदेश जारी कर दिया गया। लोढ़ा ने आगे बताया कि वर्तमान में भी यह भूमि रिकॉर्ड में नगर परिषद के नाम है, फिर भी तत्कालीन आयुक्त ने प्रार्थी से मिलीभगत कर 30 मई 2025 को पट्टा संख्या 11 से 37 तक जारी कर दिए। यह पूरी प्रक्रिया भ्रष्टाचार में लिप्त होकर की गई है। इसके अलावा, लोढ़ा ने एक पुराने बेचान विलेख (17.07.1972) का भी उल्लेख किया, जिसमें किसी खसरा संख्या का जिक्र नहीं था। कानूनन, बिना खसरा नंबर के कोई भी विक्रय विलेख शून्य माना जाता है।

वसीयत और कानूनी वैधता की कमी

लोढ़ा ने ज्ञापन में एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया कि रिडमल सिंह द्वारा जय सिंह झाबुआ के नाम से एक वसीयतनामा होने का दावा किया गया था, जो पंजीकृत भी नहीं है। बिना किसी पंजीकृत दस्तावेज या न्यायालय की घोषणा के, उपखण्ड अधिकारी ने जय सिंह को अधिकार दे दिए, जो कानून का मखौल उड़ाने जैसा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि रिकॉर्ड शुद्धि का आवेदन वही व्यक्ति दे सकता है जिसके नाम पहले से कोई भूमि हो, जबकि जय सिंह के नाम कोई भूमि दर्ज ही नहीं थी। लोढ़ा ने कलेक्टर से आग्रह किया है कि इस पूरे सिंडिकेट का पर्दाफाश किया जाए और सरकारी जमीन को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराया जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इन फर्जी पट्टों को निरस्त नहीं किया गया और भ्रष्ट अधिकारियों पर गाज नहीं गिरी, तो वे इस मुद्दे को और उच्च स्तर पर उठाएंगे।

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