मामले को लेकर 11 जनवरी को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता उदयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य अरविंद सिंह मेवाड़ के परिवार से हैं, जो महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ के उत्तराधिकारी थे। परिवार के सदस्यों के बीच उत्तराधिकार और वसीयत की वैधता को लेकर विवाद चल रहा है।
विभिन्न अदालतों से एक जगह लाए गए केस
अरविंद सिंह मेवाड़ के बेटे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने मुंबई हाईकोर्ट में लंबित मामलों को राजस्थान हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की थी। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता पद्मजा कुमारी परमार ने जोधपुर बेंच राजस्थान हाईकोर्ट में लंबित मामलों को बॉम्बे हाईकोर्ट में भेजने का आग्रह किया था। सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर इन सभी मामलों को दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि दोनों पार्टियों के बीच अन्य कोई मामले लंबित हैं, तो उन्हें भी दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने के लिए आवेदन किया जा सकता है। यह फैसला विवादों को एक ही मंच पर सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मेवाड़ राजपरिवार का दशकों पुराना संपत्ति विवाद
मेवाड़ के पूर्व राज परिवार में संपत्ति विवाद कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह दशकों से चला आ रहा है। इस विवाद की जड़ें महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ के समय से जुड़ी हैं। भगवत सिंह मेवाड़ के तीन बच्चे थे: बड़े बेटे महेंद्र सिंह, छोटे बेटे अरविंद सिंह और बेटी योगेश्वरी कुमारी।
भगवत सिंह मेवाड़ का 1983 का फैसला
भगवत सिंह मेवाड़ ने 1983 में पारिवारिक संपत्तियों को बेचने और लीज पर देने का एक बड़ा फैसला लिया था। उनका यह निर्णय बड़े बेटे महेंद्र सिंह को बिल्कुल पसंद नहीं आया। महेंद्र सिंह ने अपने पिता के फैसले के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिससे परिवार में विवाद और गहरा गया। इस घटनाक्रम के बाद, बड़े बेटे से नाराज भगवत सिंह मेवाड़ ने अपनी वसीयत और संपत्ति से जुड़े सभी महत्वपूर्ण फैसलों की जिम्मेदारी छोटे बेटे अरविंद सिंह मेवाड़ को सौंप दी थी। इस फैसले के परिणामस्वरूप, महेंद्र सिंह मेवाड़ को ट्रस्ट और अधिकांश पारिवारिक संपत्ति से लगभग बाहर कर दिया गया था।
भगवत सिंह के निधन के बाद बढ़ा विवाद
3 नवंबर 1984 को महाराणा भगवत सिंह के निधन के बाद मेवाड़ के पूर्व राज परिवार का संपत्ति विवाद और भी गहरा गया। यह विवाद लगभग 37 साल तक कानूनी लड़ाई के रूप में चला। आखिरकार, 2020 में उदयपुर की जिला अदालत ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
अदालत ने विवादित संपत्ति को चार हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। इसमें एक हिस्सा भगवत सिंह मेवाड़ के नाम पर रखा गया, जबकि बाकी तीन हिस्से उनकी तीनों संतानों के बीच बांटने के आदेश हुए। कोर्ट के इस फैसले तक, अधिकांश संपत्ति अरविंद सिंह मेवाड़ के कब्जे में रही थी।
महेंद्र सिंह मेवाड़ और उनकी बहन योगेश्वरी कुमारी को संपत्ति का एक सीमित हिस्सा ही मिल पाया। अदालत ने शंभू निवास पैलेस, बड़ी पाल और घासघर जैसी कुछ विशिष्ट संपत्तियों से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाने का भी आदेश दिया था। यह फैसला परिवार के लिए एक बड़ी राहत थी, लेकिन विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
वर्तमान विवाद का केंद्र बिंदु
वर्तमान में, यह संपत्ति विवाद अरविंद सिंह मेवाड़ की वसीयत को चुनौती देने के इर्द-गिर्द केंद्रित है। उनकी बेटी पद्मजा कुमारी परमार ने इस वसीयत की वैधता और उसमें किए गए प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ परिवार के मौजूदा उत्तराधिकारी के तौर पर एचआरएच ग्रुप ऑफ होटल का सफलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई इस जटिल और लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक विवाद में एक नया और महत्वपूर्ण मोड़ ला सकती है। इस मामले पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।