एक बार किसी भोले आदमी की चाकरी से प्रसन्न हो कर ठिकाणे ठाकर ने उसे घोड़ा और खांडा बक्शीश में दिया। आम आदमी को भारत रत्न मिल जाए तो 'छंट' रहता है?
कड़ाके की रात, घरबार ठिकाने से तनिक दूर और मोट्यार घर पहुंचने को उतावळा। तिस पर घोड़े पर बैठना न जाने। आखिर लगाम पकड़कर 'धर कूंचां धर मंजलां' चलने लगा।
शरीर ठंड में ठिठुरकर ठूंठा हुआ जा रहा था। हाथों पैरों में टूंटे जमने लगे। रात के रास्ते ने रड़क निकाल दी। किसी गांव के गुवाड़ से जलती अंगीठी की लपटें दिखी तो सोचा थोड़ा तप लें।
घोड़े को रास्ते में ही खांडा रोप कर उससे बांध दिया और जाकर तपने लगा। गांव वालों ने अनजान आदमी से पूछा- "बटाऊ! सिंह की दाढ़ों जैसी ठंड में घर से क्योंकर निकले? कहां से आए और कहां जाओगे? "