Highlights
- राजस्थान उच्च न्यायालय ने माउंट आबू और तलहटी में सभी निर्माण कार्यों पर लगाई है रोक।
- कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा की खंडपीठ ने जारी किए थे सख्त आदेश।
- चुंगी नाके पर कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर निरंतर जारी है निर्माण कार्य।
- नगर पालिका आयुक्त के सार्वजनिक आदेश के बावजूद धरातल पर नहीं दिख रहा असर।
माउंट आबू | राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू में इन दिनों न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच एक विरोधाभासी स्थिति देखने को मिल रही है। राजस्थान उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने हाल ही में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए माउंट आबू और आबूरोड के तलहटी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी थी। लेकिन, धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। स्थानीय निवासियों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, माउंट आबू के चुंगी नाके पर माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों को दरकिनार करते हुए निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी है।
उच्च न्यायालय का सख्त रुख और आदेश
6 मार्च शुक्रवार को राजस्थान उच्च न्यायालय की डबल बेंच, जिसमें माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और वरिष्ठ न्यायाधीश बलजिंदर सिंह संधु शामिल थे, ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। याचिकाकर्ता नितिन जैन, मनोज चौरसिया और अन्य द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने माउंट आबू सहित आबूरोड के तलहटी क्षेत्र में चल रहे सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाने का आदेश दिया था। न्यायालय का यह आदेश इस क्षेत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को देखते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
चुंगी नाके पर नियमों का उल्लंघन
अदालत के इतने सख्त आदेश के बावजूद, माउंट आबू के चुंगी नाके पर निर्माण कार्य का निरंतर जारी रहना कई गंभीर सवाल पैदा करता है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या ये निर्माण कार्य सरकारी संरक्षण में हो रहे हैं? कानून की नजर में सभी बराबर हैं, और राजस्थान उच्च न्यायालय की डबल बेंच के आदेश अक्षरत: सभी पर लागू होते हैं, चाहे वह निजी व्यक्ति हो या कोई सरकारी विभाग। तस्वीरों और मौके की स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय के आदेशों की खुलेआम अवहेलना की जा रही है।
प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण में स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। प्रश्न यह उठता है कि क्या अभी भी इसके लिए सिरोही के ए.डी.एस.पी. किशोर सिंह या अन्य उच्चाधिकारी जिम्मेदार हैं? यदि नहीं, तो आखिर किसकी शह पर यह निर्माण कार्य जारी है? क्या कानून की व्यवस्था और अदालती आदेश सरकारी कारकुनों और आम जनता पर अलग-अलग तरीके से लागू होते हैं? जब समस्त माउंट आबू और तलहटी क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो नगर पालिका और स्थानीय एसडीएम की निगरानी में यह कार्य कैसे संभव हो पा रहा है?

नगर पालिका आयुक्त की दोहरी नीति?
हैरानी की बात यह है कि स्वयं नगर पालिका आयुक्त आशुतोष आचार्य ने शनिवार को एक सार्वजनिक नोटिस जारी कर स्पष्ट किया था कि माउंट आबू में होने वाले सभी निर्माण कार्य, चाहे उनके पास पूर्व अनुमति ही क्यों न हो, उन पर पूर्णतया रोक लगा दी गई है। इसके बावजूद, चुंगी नाके पर काम का जारी रहना आयुक्त के आदेशों और उच्च न्यायालय की गरिमा, दोनों को चुनौती दे रहा है। स्थानीय जागरूक नागरिकों का कहना है कि प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति कर रहा है, जबकि जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही है।

न्यायिक हस्तक्षेप की उम्मीद
अब सबकी नजरें राजस्थान उच्च न्यायालय पर टिकी हैं। क्या न्यायालय इस मामले में स्वयं संज्ञान (Suo-moto) लेगा? न्यायिक आदेशों की इस तरह अवहेलना न केवल कानून व्यवस्था के लिए खतरा है, बल्कि यह माउंट आबू जैसे संवेदनशील पर्यावरण वाले क्षेत्र के लिए भी विनाशकारी सिद्ध हो सकती है। यदि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में न्यायिक आदेशों की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। स्थानीय जनता अब यह मांग कर रही है कि इस अवैध निर्माण को तुरंत रुकवाया जाए और दोषियों को दंडित किया जाए।
राजनीति