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राजस्थान

ओरण के लिए भाटी की हुंकार: ओरण संरक्षण के लिए रविंद्र सिंह भाटी ने फिर भरी हुंकार, बोले- मांग पूरी नहीं तो होगा बड़ा जन आंदोलन

मानवेन्द्र जैतावत

शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने पोकरण में ओरण भूमि के संरक्षण को लेकर सरकार को चेतावनी दी है। उन्होंने मांग की है कि ओरण को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए, अन्यथा बड़ा आंदोलन होगा।

HIGHLIGHTS

  • रविंद्र सिंह भाटी ने ओरण को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने की मांग उठाई।
  • मांग पूरी न होने पर प्रदेशव्यापी बड़े जन आंदोलन की चेतावनी दी।
  • पश्चिमी राजस्थान में रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों द्वारा ओरण भूमि के अधिग्रहण का विरोध।
  • ओरण को स्थानीय संस्कृति, आस्था और पशुपालकों की जीवनरेखा बताया।
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पोकरण | राजस्थान की राजनीति में युवाओं के चहेते और शिव विधानसभा क्षेत्र के विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने एक बार फिर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। शनिवार को पोकरण पहुंचने पर भाटी ने ओरण भूमि के संरक्षण के मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की।

पोकरण में जोधपुर रोड पर आयोजित एक निजी समारोह में शिरकत करने पहुंचे विधायक भाटी का स्थानीय युवाओं और समर्थकों ने भव्य स्वागत किया। इस दौरान हजारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने के लिए उमड़ पड़े।

भाटी ने मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि ओरण और गोचर भूमि केवल जमीन के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि यह पश्चिमी राजस्थान की पहचान और हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इन्हें बचाना अब अनिवार्य हो गया है।

क्या है ओरण और इसका महत्व?

ओरण राजस्थान, विशेषकर थार रेगिस्तान के गांवों में छोड़ी गई वह सामूहिक भूमि है जिसे ग्रामीण 'देवताओं का उपवन' मानते हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है।

हर ओरण किसी न किसी स्थानीय लोक देवता जैसे तेजाजी, पाबूजी या देगराय माता को समर्पित होती है। यहां के पेड़ों, विशेषकर खेजड़ी और रोहिड़ा को काटना महापाप माना जाता है।

यह भूमि न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह वन्यजीवों जैसे गोडावण और हिरण का सुरक्षित प्राकृतिक आवास भी है। इसके बिना थार का पारिस्थितिकी तंत्र अधूरा है।

राजस्व रिकॉर्ड का पेच और विवाद

विवाद की मुख्य जड़ सरकारी दस्तावेज हैं। वर्तमान में सदियों पुरानी इन ओरण भूमियों को सरकारी रिकॉर्ड में 'बंजर' या 'राजस्व भूमि' के रूप में दर्ज किया गया है।

इस तकनीकी खामी का फायदा उठाकर सरकारें इन जमीनों को विकास परियोजनाओं के लिए आवंटित कर देती हैं। इससे स्थानीय ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त है।

रविंद्र सिंह भाटी की प्रमुख मांग है कि इन जमीनों को तुरंत 'ओरण' के रूप में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए ताकि इनका स्वरूप कभी न बदला जा सके।

रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों से टकराव

जैसलमेर और बाड़मेर में सौर और पवन ऊर्जा के बड़े-बड़े प्लांट लग रहे हैं। इन कंपनियों को जमीन आवंटित करते समय सरकार अक्सर ओरण भूमियों को भी शामिल कर लेती है।

जब ये कंपनियां वहां फेंसिंग करती हैं, तो सदियों से चले आ रहे पशुओं के चारागाह और रास्ते बंद हो जाते हैं। इससे पशुपालकों की आजीविका पर सीधा प्रहार हो रहा है।

भाटी ने आरोप लगाया कि बड़ी कंपनियां मुनाफे के चक्कर में हमारी विरासत को नष्ट कर रही हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने कंपनियों को नहीं रोका, तो परिणाम गंभीर होंगे।

सड़क से सदन तक की लड़ाई

विधायक ने कहा कि यह लड़ाई केवल पोकरण या शिव की नहीं है, बल्कि पूरे मारवाड़ की है। उन्होंने कहा, "अगर मांगें नहीं मानी गईं, तो हम सड़क से लेकर विधानसभा तक संघर्ष करेंगे।"

भाटी ने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी विरासत को बचाने के लिए एकजुट हों। उन्होंने संकेत दिया कि आगामी दिनों में एक बड़ा जन-आंदोलन पूरे प्रदेश में शुरू किया जा सकता है।

सोशल मीडिया पर चल रहे 'विश्वास' ट्रेंड पर उन्होंने कहा कि जनता का भरोसा ही उनकी ताकत है। वह किसी भी कीमत पर जनता की उम्मीदों को टूटने नहीं देंगे।

राजनीतिक मायने और भविष्य

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाटी इस मुद्दे के जरिए पश्चिमी राजस्थान के मूल निवासियों और पशुपालक समुदायों को एक बड़े मंच पर ला रहे हैं।

यह मुद्दा न केवल पर्यावरणीय है, बल्कि यह भावनात्मक और आर्थिक रूप से भी लाखों लोगों से जुड़ा है। भाटी का यह स्टैंड राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

एक तरफ सरकार औद्योगिक विकास और अक्षय ऊर्जा के लक्ष्यों को पूरा करना चाहती है, तो दूसरी तरफ रविंद्र भाटी विरासत और जनहित की रक्षा की बात कर रहे हैं।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भजनलाल सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और भाटी का अगला कदम क्या होता है।

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