भीलवाड़ा | राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने समाज की पुरानी सोच को झकझोर कर रख दिया है। अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर जहां युवाओं की शादियां होती हैं, वहीं भीलवाड़ा में बुजुर्गों के लिए एक विशेष विवाह परिचय सम्मेलन का आयोजन किया गया।
इस सम्मेलन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें 50 साल से लेकर 80 साल तक के बुजुर्गों ने हिस्सा लिया। ये वो लोग थे जो उम्र के इस पड़ाव पर अकेलेपन की मार झेल रहे हैं।
भीलवाड़ा के नागौरी गार्डन स्थित स्वाध्याय भवन में रविवार को आयोजित इस 'बुजुर्ग विवाह परिचय सम्मेलन' में देशभर से करीब 105 बुजुर्गों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
इन बुजुर्गों का दर्द एक जैसा था—घर में सब कुछ होने के बावजूद बात करने के लिए किसी एक साथी की कमी। इसी कमी को पूरा करने के लिए वे यहां पहुंचे थे।
80 की उम्र में जीवनसाथी की तलाश: भीलवाड़ा में बुजुर्गों का अनोखा विवाह सम्मेलन: 80 साल के बुजुर्गों ने भी ढूंढा जीवनसाथी, अकेलेपन को कहा अलविदा
भीलवाड़ा में आयोजित बुजुर्ग विवाह सम्मेलन में देशभर से आए वरिष्ठ नागरिकों ने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए जीवनसाथी की तलाश की। 80 साल तक के बुजुर्गों ने इस अनूठी पहल में हिस्सा लिया और एक-दूसरे के साथ नंबर साझा किए।
HIGHLIGHTS
- भीलवाड़ा में अक्षय तृतीया पर आयोजित सम्मेलन में देशभर से 105 बुजुर्ग शामिल हुए।
- 80 साल की मां अपनी 55 साल की विधवा बेटी के लिए हमसफर ढूंढने पहुंचीं।
- पंजाब नेशनल बैंक के रिटायर्ड मैनेजर ने 70 की उम्र में अकेलेपन को दूर करने की पहल की।
- अनुबंध फाउंडेशन द्वारा अब तक 224 बुजुर्गों का विवाह संपन्न कराया जा चुका है।
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अकेलेपन की दास्तां: गीता देवी का संघर्ष
सम्मेलन में गुजरात के अहमदाबाद से आईं गीता देवी की कहानी ने सबका दिल पसीज दिया। उन्होंने बताया कि उनकी शादी साल 1994 में हुई थी।
शादी के महज चार साल बाद ही एक दर्दनाक हादसे ने उनकी दुनिया उजाड़ दी। साल 1998 में एक एक्सीडेंट में उनके पति का निधन हो गया।
उस समय गीता देवी की उम्र बहुत कम थी, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों की खातिर दूसरी शादी नहीं की। पिछले 28 सालों से वह अकेले ही सारी जिम्मेदारियां उठा रही हैं।
गीता देवी के दो बेटियां और एक बेटा है। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों की शादी बड़ी धूमधाम से कर दी है और अब उनका बेटा उनके साथ रहता है।
हैरानी और खुशी की बात यह है कि गीता देवी का बेटा ही उन्हें इस सम्मेलन में लेकर आया। उनका बेटा चाहता है कि उसकी मां अब अपने लिए जिए।
गीता देवी कहती हैं, "बेटियां अपने घर चली गईं और बेटा अपने काम में व्यस्त रहता है। घर में दीवारें काटने को दौड़ती हैं। मुझे बस एक ऐसा साथी चाहिए जिससे मैं मन की बात कर सकूं।"
रिटायर्ड बैंक मैनेजर की नई उम्मीद
पंजाब के चंडीगढ़ से आए डॉ. दिलबाग राय भाटिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह पंजाब नेशनल बैंक में मैनेजर के पद से रिटायर हुए हैं।
डॉ. भाटिया ने बताया कि उनकी पत्नी भी सरकारी सेवा में थीं। उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक 10 दिन पहले 23 अक्टूबर 2014 को उनकी पत्नी का निधन हो गया।
पत्नी के जाने के बाद 12 साल तक उन्होंने खुद को व्यस्त रखने की कोशिश की, लेकिन 70 की उम्र पार करते ही उन्हें अहसास हुआ कि जीवनसाथी के बिना जीना मुश्किल है।
डॉ. भाटिया का बेटा पुणे में लेक्चरर है और उनकी बहू दिल्ली में डॉक्टर है। बेटी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। पूरा परिवार सेटल है, लेकिन भाटिया जी अकेले हैं।
वे कहते हैं, "मैं आज भी बहुत एक्टिव हूं और बैंक मैनेजर के समय से ज्यादा काम करता हूं, लेकिन शाम को घर लौटने पर खालीपन महसूस होता है।"
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80 साल की मां और 55 साल की बेटी
सम्मेलन में एक और भावुक कर देने वाला दृश्य दिखा, जब 80 साल की एक बुजुर्ग महिला अपनी 55 साल की बेटी का हाथ थामे वहां पहुंचीं।
मां ने बताया कि उनकी बेटी के पति का निधन हो चुका है और वह पूरी तरह अकेली हो गई है। वह अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी को फिर से बसते देखना चाहती हैं।
इस सम्मेलन में राजस्थान के अलावा पंजाब, गुजरात, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों से भी लोग अपने जीवन के खालीपन को भरने आए थे।
अनुबंध फाउंडेशन: एक मसीहा की तरह
इस पूरे आयोजन के पीछे अहमदाबाद की 'अनुबंध फाउंडेशन' संस्था का हाथ है। संस्था के अध्यक्ष नंदूभाई पटेल ने इस नेक काम की शुरुआत के पीछे की वजह साझा की।
नंदूभाई ने बताया कि साल 2001 में गुजरात में आए विनाशकारी भूकंप ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया था। उस समय कई बुजुर्गों ने अपने जीवनसाथी खो दिए थे।
उस त्रासदी के बाद बुजुर्गों के बीच फैले अकेलेपन और अवसाद को देखकर नंदूभाई ने तय किया कि वे उनके लिए एक मंच तैयार करेंगे।
साल 2002 से शुरू हुआ यह सफर आज 95वें सम्मेलन तक पहुंच गया है। अब तक इस संस्था के जरिए 16 हजार से ज्यादा बुजुर्ग जुड़ चुके हैं।
नंदूभाई के प्रयासों का ही नतीजा है कि अब तक 224 जोड़े फिर से विवाह के बंधन में बंधकर एक खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।
सामाजिक सोच में बदलाव की जरूरत
सम्मेलन के आयोजक अशोक जैन ने बताया कि समाज अक्सर बुजुर्गों की रोटी, कपड़ा और मकान जैसी जरूरतों को तो समझता है, लेकिन उनकी भावनाओं को भूल जाता है।
बुजुर्गों को भी प्यार, सम्मान और एक ऐसे साथी की जरूरत होती है जो उनकी बीमारियों और सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहे।
सम्मेलन के दौरान कई बुजुर्गों ने एक-दूसरे से बातचीत की, अपने शौक साझा किए और अंत में एक-दूसरे के मोबाइल नंबर भी लिए।
आयोजकों को उम्मीद है कि इस सम्मेलन के माध्यम से अगले कुछ दिनों में कम से कम 4 से 5 जोड़े कोर्ट मैरिज के जरिए एक नई शुरुआत करेंगे।
संस्था का कहना है कि यदि दोनों पक्ष सहमत होते हैं, तो शादी का पूरा खर्च और कानूनी औपचारिकताएं संस्था खुद पूरी करेगी।
अंत में, यह सम्मेलन यह संदेश देता है कि खुश रहने और अपना साथी चुनने का अधिकार किसी भी उम्र में खत्म नहीं होता।
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