सिरोही |आज के दौर में जहां लोग अपने लिए भी समय नहीं निकाल पाते, वहीं सिरोही के दीपक तोलानी इंसानियत की एक अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। वे पिछले 11 वर्षों से बेजुबान श्वानों की भूख मिटाने के नेक काम में जुटे हुए हैं। शहर की गलियों में घूमकर श्वानों को दूध और रोटी खिलाना उनकी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन गया है।
इंसानियत की मिसाल: सिरोही: 11 साल से बेजुबानों की भूख मिटा रहे दीपक तोलानी
सिरोही के दीपक तोलानी 11 साल से बेजुबानों की भूख मिटा रहे हैं। वे रोजाना शहर में घूमकर श्वानों को दूध और रोटी खिलाने की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं।
HIGHLIGHTS
- दीपक तोलानी पिछले 11 वर्षों से सिरोही में बेजुबान श्वानों की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं।
- वे रोजाना अपनी स्कूटी पर दूध और रोटी लेकर शहर के विभिन्न हिस्सों में श्वानों को खिलाते हैं।
- यह सेवा एक साधारण विचार से शुरू हुई थी कि इन बेजुबान जानवरों का पेट कौन भरता है।
- शुरुआत में पैदल सेवा करने वाले दीपक को बाद में लोगों का सहयोग मिला और सेवा का कारवां बढ़ता गया।
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सेवा का संकल्प कैसे बना?
दीपक बताते हैं कि इस सेवा की शुरुआत एक साधारण से विचार से हुई थी। लगभग 11 साल पहले, जब वे घर पर भोजन कर रहे थे, तो उनके मन में यह ख्याल आया कि इंसान तो अपने लिए भोजन का प्रबंध कर लेता है, लेकिन इन बेजुबान जानवरों का क्या होता है?
उनके मन में यह सवाल घर कर गया कि इन श्वानों का पेट भरने वाला कौन है। बस यही एक विचार धीरे-धीरे एक मजबूत संकल्प में बदल गया और उन्होंने इन बेजुबानों की सेवा करने का फैसला किया।
शुरुआती संघर्ष और लोगों का साथ
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उस समय दीपक गोली-बिस्कुट की सप्लाई का काम करते थे। उनके पास जो भी पैसे आते, वे उसमें से कुछ राशि बचाकर श्वानों के लिए दूध और रोटी की व्यवस्था करते थे।
पैदल शुरू हुआ सफर
शुरुआती दिनों में, वे पैदल ही शहर की अलग-अलग गलियों में घूमते थे और जहां भी कोई भूखा श्वान मिलता, उसे अपने हाथों से खाना खिलाते थे। उनका यह निस्वार्थ भाव और सेवा देखकर शहर के अन्य लोग भी प्रभावित हुए।
सेवा के लिए मिली स्कूटी
धीरे-धीरे, लोगों ने उनके इस नेक काम में सहयोग करना शुरू कर दिया। कुछ लोग दूध की व्यवस्था करने लगे तो कुछ रोटी में हाथ बंटाने लगे। सेवा का यह कारवां बढ़ता गया और बाद में लोगों ने दीपक को एक स्कूटी भी उपलब्ध करवाई। स्कूटी मिलने से उनका काम और भी आसान हो गया और वे शहर के दूर-दराज के इलाकों में भी आसानी से पहुंचने लगे।
इंसानियत की जीती-जागती मिसाल
आज दीपक अपनी स्कूटी पर दूध और रोटी के बर्तन लेकर शहर में घूमते हैं और नियमित रूप से बेजुबान श्वानों को भोजन करवाते हैं। 11 साल पहले उठाया गया एक छोटा सा कदम आज सेवा की ऐसी मिसाल बन चुका है, जो यह सिखाता है कि सच्ची मानवता केवल इंसानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बेजुबानों के प्रति संवेदना रखना भी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।