सिरोही | क्या राजस्थान की ग्राम पंचायतों में बिना काम के ही लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं? सिरोही जिले की पिंडवाड़ा तहसील की रोहिड़ा ग्राम पंचायत से एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां सरपंच पर फर्जी आईडी से लाखों रुपये के भुगतान उठाने का आरोप है।
सरपंच का फर्जी ID कांड: फर्जी ID से लाखों का भुगतान, सरपंच का खेल उजागर!
सिरोही में सरपंच ने वार्ड पंच की फर्जी ID से लाखों उठाए! जांच में गड़बड़ी मिली, पर सत्ता के रसूख से रुकी कार्रवाई।
HIGHLIGHTS
- सिरोही की रोहिड़ा पंचायत के सरपंच पर फर्जी आईडी से लाखों के भुगतान का गंभीर आरोप लगा है।
- सरपंच की अपनी आईडी दो आधार कार्ड होने के कारण ब्लॉक थी, जिसके बाद एक वार्ड पंच की आईडी का इस्तेमाल हुआ।
- जिला परिषद की जांच कमेटी ने भुगतान में गड़बड़ी मानी, लेकिन ऑडिट विभाग को जांच का पत्र आज तक नहीं भेजा गया।
- आरोप है कि सत्ताधारी पार्टी का जिला मंत्री होने के कारण सरपंच अपने रसूख से जांच को प्रभावित कर रहा है।
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ग्रामीणों का आरोप है कि यह सब सत्ता के रसूख के दम पर हो रहा है और अधिकारी भी इस घोटाले पर पर्दा डालने में लगे हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह कहानी शुरू होती है साल 2020 से, जब रोहिड़ा में नए सरपंच का चुनाव हुआ।
चुनाव जीतने के बाद पता चला कि सरपंच के पास दो आधार कार्ड थे, जिसकी वजह से उनकी सरकारी आईडी मैप नहीं हो पाई और उसे ब्लॉक कर दिया गया।
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अब सवाल उठा कि पंचायत के भुगतान कैसे होंगे? ग्रामीणों के अनुसार, यहीं से इस पूरे खेल की शुरुआत हुई।
फर्जी आईडी का इस्तेमाल
आरोप है कि सरपंच ने अपनी आईडी बंद होने पर एक वार्ड पंच की आईडी का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
2020 से लेकर 2023 तक, जब तक सरपंच की आईडी वापस चालू नहीं हुई, इसी फर्जी आईडी से लाखों रुपये के भुगतान किए गए।
ग्रामीणों को जब इस बात की भनक लगी, तो उन्होंने इसकी शिकायत जिला कलेक्टर से की।
जांच में क्या सामने आया?
मामला सामने आने के बाद जिला परिषद ने एक जांच कमेटी का गठन किया।
कमेटी ने अपनी जांच में यह मान लिया कि भुगतान प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है।
उन्होंने सिफारिश की कि इस मामले की गहराई से जांच के लिए इसे अंकेक्षण विभाग (Audit Department) को सौंपा जाना चाहिए।
सत्ता का रसूख और रुकी हुई जांच
हैरानी की बात यह है कि जिला परिषद की कमेटी की सिफारिश के बावजूद आज तक अंकेक्षण विभाग को जांच के लिए कोई पत्र ही नहीं भेजा गया।
फाइलों को जानबूझकर दबा दिया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि इसके पीछे सरपंच का राजनीतिक रसूख है।
सरपंच वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी के जिला मंत्री हैं, और इसी पद का फायदा उठाकर वह अधिकारियों पर दबाव बना रहे हैं ताकि जांच आगे न बढ़ सके।
ग्रामीणों का कहना है, "यह मामला जब तक पूर्ण नहीं होगा चाहे हमें सत्याग्रह करना पड़े तो हम सत्याग्रह करेंगे लेकिन इस मामले को उजागर करके रहेंगे।"
यह पूरा सिस्टम इस तरह से काम कर रहा है कि जिस विभाग को जांच करनी है, उसे पता ही नहीं है कि उसे कोई जांच सौंपी गई है।
सिर्फ भुगतान ही नहीं, और भी हैं आरोप
यह मामला सिर्फ फर्जी भुगतान तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीणों ने और भी कई गंभीर आरोप लगाए हैं।
सार्वजनिक जमीन पर कब्जा
गांव के एक आम चबूतरे पर लगे पेड़ को काटकर वहां अवैध रूप से दुकान बना दी गई है।
यह दुकान सरपंच के किसी करीबी की बताई जा रही है। यह चबूतरा गांव के आदिवासियों और अन्य लोगों के बैठने और आराम करने की जगह थी, जिस पर अब कब्जा हो चुका है।
RTI का नहीं मिलता जवाब
भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए पंचायत में सूचना के अधिकार (RTI) कानून को भी ताक पर रख दिया गया है।
कोई भी ग्रामीण अगर किसी काम की जानकारी के लिए आरटीआई लगाता है, तो उसे कोई जवाब नहीं दिया जाता।
2023 में सरपंच ने दिल्ली जाकर अपनी आईडी तो वापस चालू करवा ली, लेकिन 2020 से 2023 के बीच हुए उन फर्जी भुगतानों का क्या? उन पैसों का हिसाब कौन देगा? यह सवाल आज भी बना हुआ है। यह मामला राजस्थान के पंचायती राज सिस्टम में फैले गहरे भ्रष्टाचार और राजनीतिक सांठगांठ की एक बानगी है, जहां नियमों को तोड़-मरोड़कर जनता के पैसे का दुरुपयोग किया जा रहा है और शिकायत करने पर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही।
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