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राज्य

तपती गर्मी में बच्चों का संघर्ष: 40 डिग्री में पैदल स्कूल जाते मासूम, उदयपुर प्रशासन मौन

गणपत सिंह मांडोली

भीषण गर्मी और लू के बीच उदयपुर में स्कूल समय में बदलाव न होने से बच्चे परेशान हैं।

HIGHLIGHTS

  • उदयपुर में 40 डिग्री तापमान के बावजूद स्कूलों के समय में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
  • दूसरी पारी के छात्र दोपहर 12:30 से शाम 6 बजे तक भीषण लू के बीच स्कूल जाने को मजबूर हैं।
  • जयपुर, कोटा और जैसलमेर जैसे जिलों में समय बदला गया, लेकिन उदयपुर प्रशासन अब भी सुस्त है।
  • हजारों बच्चे 3 किलोमीटर तक पैदल चलकर स्कूल जा रहे हैं, जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ गया है।
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उदयपुर | राजस्थान के कई जिलों में भीषण गर्मी को देखते हुए स्कूलों के समय में परिवर्तन किया गया है, लेकिन उदयपुर में प्रशासन की सुस्ती मासूमों पर भारी पड़ रही है। तपती सड़कों पर भारी बस्ते लेकर चलते बच्चे प्रशासन के संवेदनहीन रवैये की कहानी बयां कर रहे हैं।

भीषण गर्मी और प्रशासनिक उदासीनता

राजस्थान में सूरज की तपिश अब जानलेवा साबित हो रही है और पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है।

भीषण गर्मी के इस दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित वे स्कूली बच्चे हो रहे हैं जिन्हें दोपहर की चिलचिलाती धूप में घर लौटना पड़ता है।

उदयपुर जिले में अभी तक स्कूल समय में कोई ठोस बदलाव नहीं किया गया है, जबकि अन्य जिलों में राहत दी जा चुकी है।

जयपुर, जैसलमेर, चित्तौड़गढ़, कोटा और दौसा जैसे जिलों में प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाते हुए समय बदल दिया है।

कहीं स्कूलों का समय घटाया गया है तो कहीं सुबह की पारी को प्राथमिकता देकर बच्चों को धूप से बचाया जा रहा है।

लेकिन उदयपुर में स्थिति इसके विपरीत है, यहाँ छोटे-छोटे बच्चे दोपहर की झुलसाती धूप में पैदल चलने को मजबूर हैं।

सड़कों से उठती लपटें और सिर पर भारी बस्ते का बोझ इन नौनिहालों की परीक्षा ले रहा है।

अभिभावकों का कहना है कि प्रशासन शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, तभी कोई फैसला नहीं लिया जा रहा।

दूसरी पारी के स्कूलों का संकट

उदयपुर में दूसरी पारी के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की हालत सबसे ज्यादा खराब है।

ये बच्चे दोपहर 12:30 बजे स्कूल जाते हैं और शाम 6 बजे वापस लौटते हैं, जो गर्मी का सबसे खतरनाक समय है।

दूसरी पारी में मुख्य रूप से नर्सरी से लेकर कक्षा आठ तक के छोटे बच्चे पढ़ते हैं, जिनकी सहनशक्ति कम होती है।

इन बच्चों को लू लगने और डिहाइड्रेशन होने का खतरा लगातार बना रहता है, लेकिन स्कूल प्रबंधन मजबूर है।

जब तक जिला प्रशासन या शिक्षा विभाग से आधिकारिक आदेश नहीं आता, तब तक स्कूल समय नहीं बदल सकते।

यह विडंबना ही है कि जो बच्चे देश का भविष्य हैं, उन्हें ही इस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।

अकेले उदयपुर के पायड़ा स्थित एमजीजीएस स्कूल में 195 बच्चे इस भीषण गर्मी में पढ़ाई कर रहे हैं।

इसी तरह सिंधी भाषाई विद्यालय प्रतापनगर में 92 बच्चे दोपहर की पाली में आने-जाने को विवश हैं।

आंकड़ों में बच्चों का दर्द

सरकारी आंकड़ों की बात करें तो हजारों बच्चे इस समय राजस्थान के विभिन्न जिलों में गर्मी की मार झेल रहे हैं।

उदयपुर के एमजीजीएस पडूना में 398 बच्चे दूसरी पारी में पढ़ रहे हैं, जो एक बड़ी संख्या है।

बड़ी उन्दरी स्कूल में 295 और नागानगरी में 50 छात्र इसी तरह की परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

सिर्फ उदयपुर ही नहीं, अजमेर के रायपुर (ब्यावर) में भी 275 छात्र दोपहर की तपिश में झुलस रहे हैं।

जोधपुर के आसोप में 265 छात्र इस भीषण गर्मी में स्कूल आने-जाने को मजबूर हैं, जहाँ पारा अक्सर ऊंचा रहता है।

इन बच्चों के पास अक्सर निजी वाहनों की सुविधा नहीं होती और वे मीलों पैदल चलकर स्कूल पहुँचते हैं।

तपती सड़कें और पैरों में साधारण जूते बच्चों की थकान को कई गुना बढ़ा देते हैं।

प्रशासन को यह समझना होगा कि कागजी आदेशों से ज्यादा जमीनी हकीकत मायने रखती है।

स्वास्थ्य पर पड़ रहा बुरा असर

चिकित्सकों का मानना है कि 40 डिग्री तापमान में बच्चों का बाहर निकलना उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।

लू लगने से बच्चों में तेज बुखार, सिरदर्द और चक्कर आने जैसी समस्याएँ आम हो गई हैं।

डिहाइड्रेशन के कारण बच्चों की एकाग्रता कम हो रही है और वे स्कूल में भी बीमार पड़ रहे हैं।

छोटे बच्चों का शरीर बड़ों की तुलना में गर्मी को जल्दी सोखता है, जिससे उन्हें हीट स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है।

अस्पतालों में इन दिनों गर्मी से बीमार होने वाले बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा देखा जा रहा है।

अभिभावक डरे हुए हैं कि कहीं उनके बच्चे स्कूल जाने के चक्कर में गंभीर रूप से बीमार न पड़ जाएं।

शिक्षा विभाग को स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह मानकर तुरंत प्रभाव से समय में कटौती करनी चाहिए।

बच्चों की सेहत के साथ किसी भी तरह का समझौता भविष्य के लिए महंगा साबित हो सकता है।

दफ्तरों के फैसले और जमीनी हकीकत

अक्सर देखा जाता है कि एयर कंडीशनर कमरों में बैठकर अधिकारी फैसले लेते हैं, जिनका जमीन से कोई नाता नहीं होता।

उदयपुर के मामले में भी यही हो रहा है, जहाँ फाइलों में तो सब ठीक है पर सड़कों पर बच्चे बेहाल हैं।

कागजों में पहली पारी का समय सुबह 7:30 से 1 बजे तक दर्शाया जाता है, जो फिर भी स्वीकार्य है।

लेकिन दूसरी पारी का सुबह 7 से शाम 6 बजे तक का समय छोटे बच्चों के लिए किसी सजा से कम नहीं है।

वास्तविकता यह है कि छोटे बच्चों को दिन के सबसे खतरनाक समय में घर से बाहर निकलना पड़ता है।

प्रशासन को चाहिए कि वह तुरंत प्रभाव से दूसरी पारी को सुबह की पारी में शिफ्ट करने का आदेश दे।

अगर स्कूल में जगह की कमी है, तो विशेष अवकाश या रोटेशन प्रणाली का उपयोग किया जा सकता है।

"छोटे बच्चों को इस गर्मी में पैदल चलते देखना हृदयविदारक है। प्रशासन को तुरंत समय बदलना चाहिए।"

अभिभावकों की बढ़ती चिंता

उदयपुर के विभिन्न क्षेत्रों के अभिभावकों ने सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से अपना रोष प्रकट किया है।

उनका कहना है कि जब अन्य जिलों के कलेक्टर समय बदल सकते हैं, तो उदयपुर में देरी क्यों हो रही है?

कई अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है क्योंकि वे उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।

शिक्षा का अधिकार जरूरी है, लेकिन जीवन का अधिकार उससे कहीं ज्यादा प्राथमिक है।

स्कूलों में भी पीने के ठंडे पानी और छाया की उचित व्यवस्था न होना आग में घी डालने का काम कर रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी बदतर है, जहाँ बच्चों को जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरना पड़ता है।

वहां न तो कोई बस की सुविधा है और न ही बीच रास्ते में कहीं छांव मिलती है।

इन नौनिहालों का पसीना प्रशासन की फाइलों में कहीं गुम होकर रह गया है।

क्या हो सकते हैं समाधान?

विशेषज्ञों का सुझाव है कि राज्य स्तर पर हीटवेव को लेकर एक समान गाइडलाइन होनी चाहिए।

किसी एक जिले में समय बदलना और दूसरे में न बदलना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।

दूसरी पारी के स्कूलों को तुरंत प्रभाव से सुबह 7:30 से 12:30 के बीच आयोजित किया जाना चाहिए।

छोटे बच्चों के लिए विशेष गर्मी की छुट्टियां घोषित करने पर भी विचार किया जा सकता है।

स्कूलों में ओआरएस और प्राथमिक चिकित्सा किट की उपलब्धता अनिवार्य की जानी चाहिए।

परिवहन की सुविधा को सुधारा जाना चाहिए ताकि बच्चों को पैदल न चलना पड़े।

सरकार को निजी स्कूलों पर भी कड़ाई से नजर रखनी चाहिए ताकि वे नियमों का उल्लंघन न करें।

जनता की मांग है कि मुख्यमंत्री इस मामले में हस्तक्षेप करें और बच्चों को राहत दिलाएं।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

उदयपुर की तपती सड़कों पर थका हुआ बचपन प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहा है।

यह केवल समय बदलने का मुद्दा नहीं है, बल्कि बच्चों के प्रति हमारी संवेदनशीलता का पैमाना है।

उम्मीद है कि आने वाले दिनों में उदयपुर प्रशासन जागृत होगा और बच्चों के हित में कड़ा फैसला लेगा।

शिक्षा व्यवस्था को बच्चों के अनुकूल होना चाहिए, न कि बच्चों को व्यवस्था के बोझ तले दबना चाहिए।

*Edit with Google AI Studio

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