उज्जैन | हमारे घरों में मंदिर का स्थान सबसे पवित्र और ऊर्जावान माना जाता है। यहां स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियां न केवल हमारी आस्था का केंद्र होती हैं, बल्कि वे घर की शांति को भी प्रभावित करती हैं।
शास्त्रों के अनुसार, यदि घर के मंदिर में मूर्तियों का रखरखाव सही ढंग से न हो, तो इसका सीधा असर हमारे मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। उचित विधि से की गई पूजा ही फलदायी होती है।
उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा बताते हैं कि पूजा-पाठ के कुछ विशेष नियम और मान्यताएं होती हैं। जिनका पालन करना हर गृहस्थ के लिए अनिवार्य माना गया है ताकि घर में सुख बना रहे।
मंदिर में खंडित मूर्ति के नुकसान: घर के मंदिर में न रखें खंडित मूर्तियां: वास्तु और धर्म के अनुसार जानें पूजा-पाठ के जरूरी नियम और सही दिशा
घर के मंदिर में मूर्तियों के रखरखाव और दिशा का गहरा प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार खंडित मूर्तियां नकारात्मकता लाती हैं, जानें सही नियम।
HIGHLIGHTS
- वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के मंदिर में कभी भी खंडित या टूटी हुई मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए।
- पूजा घर के लिए उत्तर या पूर्व दिशा को सबसे शुभ और सकारात्मक ऊर्जा वाला माना गया है।
- सोना, चांदी, तांबा और पीतल की मूर्तियां पूजा के लिए श्रेष्ठ हैं, जबकि लोहा अशुभ है।
- घर में शिवलिंग का आकार अंगूठे के पहले हिस्से से बड़ा नहीं होना चाहिए, अन्य मूर्तियां 10 इंच तक हों।
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खंडित मूर्तियों को रखने से क्यों बचें?
वास्तु शास्त्र में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि घर में खंडित मूर्तियां रखने से बचना चाहिए। टूटी हुई मूर्तियां घर में मानसिक अशांति और एकाग्रता में कमी का कारण बनती हैं।
जब हम किसी खंडित मूर्ति की पूजा करते हैं, तो जैसे ही हमारी दृष्टि उस मूर्ति के टूटे हुए हिस्से पर पड़ती है, हमारा ध्यान भटक जाता है। इससे पूजा में मन नहीं लग पाता है।
पूजा में एकाग्रता का होना सबसे महत्वपूर्ण है। अगर मन विचलित होगा, तो भक्ति का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता। इसीलिए खंडित मूर्तियों को ससम्मान विसर्जित करने का विधान शास्त्रों में दिया गया है।
पूजा घर की सही दिशा और स्वच्छता
वास्तु के नियमों के अनुसार, पूजा स्थल हमेशा घर की उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए। देवी-देवताओं की आराधना के लिए ये दोनों दिशाएं सबसे अधिक शुभ और सकारात्मक मानी जाती हैं।
पूजा केवल हाथ जोड़कर मंत्र पढ़ने तक सीमित नहीं है। शास्त्रों में इसे गहरे ध्यान और पूर्ण भक्ति के साथ करने पर जोर दिया गया है। शांत मन से की गई प्रार्थना ईश्वर तक जल्दी पहुंचती है।
मंदिर की नियमित साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। गंदगी और अव्यवस्था से नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। स्वच्छ वातावरण में ही सकारात्मक शक्तियों का वास होता है और मन प्रसन्न रहता है।
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किस धातु की मूर्ति रखना है शुभ?
मूर्तियों के लिए धातु का चुनाव भी बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। शास्त्र सोने, चांदी, तांबे, पीतल, स्फटिक और पारद से बनी मूर्तियों को घर के लिए अत्यंत श्रेष्ठ और मंगलकारी मानते हैं।
वहीं दूसरी ओर, लोहे, स्टील या एल्यूमीनियम से बनी मूर्तियों को पूजा घर में रखने से बचना चाहिए। इसके पीछे धार्मिक के साथ-साथ व्यावहारिक कारण भी बताए गए हैं जो मूर्तियों की सुरक्षा से जुड़े हैं।
पूजा के दौरान हम मूर्तियों का जल, दूध और दही से अभिषेक करते हैं। लोहे और एल्यूमीनियम जैसी धातुएं इन तरल पदार्थों के संपर्क में आकर जल्दी खराब हो सकती हैं और उनमें जंग लग सकता है।
यदि आप धातु की मूर्ति नहीं रखना चाहते हैं, तो मिट्टी या पत्थर से बनी मूर्तियां भी श्रेष्ठ होती हैं। ये प्राकृतिक तत्व घर के वातावरण को शुद्ध रखते हैं और पूजा में सात्विकता का अनुभव कराते हैं।
शिवलिंग और मूर्तियों का सही आकार
भगवान शिव का निराकार स्वरूप होने के कारण शिवलिंग के नियम थोड़े अलग हैं। शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग कभी खंडित नहीं माना जाता और खंडित अवस्था में भी इसकी पूजा की जा सकती है।
हालांकि, घर में शिवलिंग के आकार का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। घर के मंदिर में शिवलिंग का आकार अंगूठे के पहले भाग से बड़ा नहीं होना चाहिए। बड़े शिवलिंग की सेवा करना कठिन होता है।
इसी तरह, अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की ऊंचाई भी 8 से 10 इंच से अधिक नहीं होनी चाहिए। बड़े विग्रह केवल सार्वजनिक मंदिरों के लिए उपयुक्त होते हैं, जहां उनकी सेवा के कड़े नियम होते हैं।
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