जयपुर | राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर में स्थित भव्य विधान सभा भवन आज अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं और विधायी विमर्श का केंद्र बना रहा। विधान सभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित किया। यह कार्यक्रम विशेष रूप से विधायी मसौदा यानी लेजिस्लेटिव ड्राफ्टिंग तैयार करने के विषय पर केंद्रित था। देवनानी जी ने अपने संबोधन में इस बात पर गहरा जोर दिया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का मसौदा सबसे अहम होता है। उनके अनुसार, विधायी मसौदे में जनता की भावनाओं और उनकी इच्छाओं का सच्चा प्रतिबिंब होना चाहिए। भाषा इतनी सरल और स्पष्ट होनी चाहिए कि समाज का अंतिम व्यक्ति भी उसे आसानी से समझ सके। स्पीकर ने कहा कि जब कानून की भाषा सरल होती है, तभी न्याय की वास्तविक अवधारणा सिद्ध होती है। राजस्थान विधान सभा में विधेयकों को पारित करने की पूरी प्रक्रिया बहुत ही पारदर्शी और सावधानीपूर्वक अपनाई जाती है। यहाँ कानून की सर्वोत्तम गुणवत्ता सुनिश्चित करना विधान सभा की सर्वोच्च प्राथमिकता रहती है।
वासुदेव देवनानी का विधायी मंत्र: राजस्थान विधान सभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कानून निर्माण में सरलता को बताया अनिवार्य, 17 देशों के प्रतिनिधियों के साथ साझा किए अनुभव
जयपुर में आयोजित 37वें अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में स्पीकर वासुदेव देवनानी ने विधायी मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया और लोकतंत्र में पारदर्शिता के महत्व पर विस्तृत चर्चा की।
HIGHLIGHTS
- स्पीकर देवनानी ने कानून निर्माण में स्पष्ट और सरल भाषा को न्याय का मुख्य आधार बताया।
- 37वें अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में 17 देशों के 43 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
- राजस्थान विधान सभा को 'लोकतंत्र का सच्चा मंदिर' बताते हुए इसकी 75वीं वर्षगांठ का उल्लेख किया।
- डिजिटल संग्रहालय को युवाओं और लोकतंत्र के बीच एक संवाद का आधुनिक सेतु करार दिया।
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अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान का गौरव
स्पीकर वासुदेव देवनानी शनिवार को जयपुर स्थित राजस्थान विधान सभा में विधायी मसौदा तैयार करने के लिए आयोजित 37वें अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। यह कार्यक्रम भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग योजना के अंतर्गत आयोजित किया गया था। इसे लोकसभा सचिवालय के पार्लियामेंट्री रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी (PRIDE) द्वारा संचालित किया गया। इस अवसर पर दुनिया के 17 अलग-अलग देशों से प्रतिनिधि जयपुर पहुंचे थे। इन देशों में बांग्लादेश, भूटान, घाना, केन्या, श्रीलंका, तंजानिया और जाम्बिया जैसे राष्ट्र शामिल थे। कुल 43 प्रतिभागियों ने इस गहन प्रशिक्षण सत्र में भाग लिया और भारतीय विधायी प्रणाली को समझा। देवनानी जी ने सभी विदेशी मेहमानों से व्यक्तिगत रूप से परिचय प्राप्त किया और उनके साथ एक सामूहिक चित्र भी खिंचवाया। विदेशी प्रतिनिधियों ने राजस्थान की समृद्ध संसदीय परंपराओं में गहरी रुचि दिखाई और यहाँ की कार्यप्रणाली की सराहना की।
कानून निर्माण के तीन स्तंभ और प्रक्रिया
अपने विस्तृत संबोधन में देवनानी जी ने विधेयक पारित होने की संवैधानिक प्रक्रिया को गहराई से समझाया। उन्होंने बताया कि किसी भी कानून के प्रस्ताव की यात्रा तीन मुख्य और महत्वपूर्ण चरणों से होकर गुजरती है। प्रथम चरण में विधेयक को सदन के पटल पर औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है। यह चरण विधेयक की नींव रखने जैसा होता है जहाँ इसके उद्देश्यों की रूपरेखा सबके सामने आती है। द्वितीय चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसमें विधेयक के प्रत्येक प्रावधान पर गहन चर्चा की जाती है। इस दौरान अक्सर विशेष समितियों या प्रवर समितियों की मदद ली जाती है ताकि मसौदे को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। समितियों के माध्यम से विधेयक के तकनीकी और सामाजिक हर पहलू का बारीकी से विश्लेषण किया जाता है। इसके पश्चात ही सदन मतदान की प्रक्रिया के लिए एकत्रित होता है। देवनानी जी ने स्पष्ट किया कि कानून को सशक्त और सुगम बनाना ही मुख्य लक्ष्य है। स्पष्ट भाषा का प्रयोग ही वास्तव में न्याय का असली सार और आधार होता है।
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लोकतंत्र का पावन मंदिर: राजस्थान विधान सभा
राजस्थान विधान सभा को देवनानी जी ने लोकतंत्र का एक सच्चा और पावन मंदिर बताया। उन्होंने कहा कि इस सदन में समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कानून बनाए जाते हैं। विशेष रूप से राजस्थान में सामाजिक सुरक्षा से जुड़े क्रांतिकारी कानून पारित किए गए हैं जो अन्य राज्यों के लिए मिसाल हैं। वर्तमान में राजस्थान विधान सभा अपनी स्थापना की 75वीं गौरवशाली वर्षगांठ मना रही है। यह 75 वर्षों का सफर राजस्थान के विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की कहानी कहता है। राज्य के निर्माण के शुरुआती दिनों से लेकर आज के आधुनिक डिजिटल युग तक विधान सभा ने लंबी दूरी तय की है। विधान सभा ने करोड़ों लोगों के सपनों, आशाओं और आकांक्षाओं को कानूनी जामा पहनाया है। 200 सदस्यों वाली यह विधान सभा राजस्थान की जनता की सामूहिक इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है। यहाँ होने वाली हर बहस और लिया गया हर निर्णय प्रदेश के भविष्य को संवारने का कार्य करता है।
अमृतकाल का मार्ग और 2047 का संकल्प
भारत अपनी स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे करने का गौरवपूर्ण जश्न मना रहा है और अब 'अमृतकाल' के मार्ग पर अग्रसर है। स्पीकर देवनानी ने कहा कि हमारा देश अब विकास और आत्मनिर्भरता के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। अगले 25 वर्षों की यह यात्रा भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में अत्यंत निर्णायक होने वाली है। वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की 100वीं वर्षगांठ मनाएगा, तब हमारे लक्ष्य और भी ऊंचे होंगे। देवनानी जी के अनुसार, यह समय हमारे राष्ट्र के लिए आत्म-निरीक्षण करने और भविष्य के लिए बड़े लक्ष्य निर्धारित करने का है। उन्होंने प्रतिभागियों से कहा कि विधायी संस्थाओं को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा। कानून ऐसे हों जो बदलते समय की जरूरतों के साथ तालमेल बिठा सकें और प्रगति में बाधक न बनें।
डिजिटल क्रांति और गुलाबी सदन की भव्यता
जयपुर का विधान सभा भवन अपनी अद्भुत वास्तुकला और राजस्थानी शिल्प के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। देवनानी जी ने इसे 'गुलाबी सदन' संबोधित करते हुए कहा कि यह पूरे देश के विधायी निकायों के लिए एक आदर्श बन गया है। राजस्थान विधान सभा ने अपने सभी पुराने और नए विधायी अभिलेखों को पूरी तरह डिजिटलाइज कर लिया है। यह डिजिटल परिवर्तन केवल कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है। इससे शासन की प्रक्रिया में अभूतपूर्व पारदर्शिता आई है और विधायी कार्यों में गति भी बढ़ी है। विधान सभा भवन का निर्माण पारंपरिक राजस्थानी शैली और आधुनिक तकनीकी आवश्यकताओं के अनूठे मिश्रण के साथ किया गया है। इसकी सुंदरता और यहाँ का अनुशासित वातावरण हर किसी को प्रभावित करता है।
डिजिटल संग्रहालय: इतिहास और आधुनिकता का संगम
विधान सभा परिसर में स्थापित आधुनिक डिजिटल संग्रहालय एक विशेष आकर्षण का केंद्र है। देवनानी जी ने इसे जनता, विशेषकर नई पीढ़ी के युवाओं से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण सेतु बताया। यह संग्रहालय राजस्थान की लोकतांत्रिक यात्रा और राज्य के राजनीतिक इतिहास को बहुत ही रोचक तरीके से प्रदर्शित करता है। यहाँ आकर विद्यार्थी और आम नागरिक यह समझ सकते हैं कि सदन के भीतर कार्य कैसे होता है। कानून निर्माण की जटिल प्रक्रिया को दृश्यों और डिजिटल माध्यमों से बहुत ही सरल तरीके से यहाँ समझाया गया है। यह संग्रहालय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने और जनता को विधायी कार्यों के करीब लाने का एक अभिनव प्रयास है।
'पधारो म्हाारे देश' और वैश्विक विधायी सहयोग
विदेशी प्रतिभागियों से संवाद करते हुए देवनानी जी ने राजस्थान की अतिथि सत्कार की परंपरा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत की इस यात्रा से वे 'पधारो म्हाारे देश' की पवित्र भावना को और भी गहराई से समझ सकेंगे। राजस्थान के वरिष्ठ और अनुभवी विधायकों के साथ होने वाली चर्चाएं प्रतिभागियों के विधायी ज्ञान में वृद्धि करेंगी। देवनानी जी ने कहा कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम किताबी ज्ञान से परे जाकर व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर होते हैं। कानून बनाना दरअसल शासन की एक वैश्विक भाषा है जिसे साझा करके हम दुनिया भर में लोकतंत्र को सशक्त बना सकते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि विदेशी प्रतिनिधि यहाँ से न केवल ज्ञान बल्कि राजस्थान की मीठी यादें भी अपने साथ लेकर जाएंगे।
गरिमामयी उपस्थिति और समापन सत्र
इस महत्वपूर्ण और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में राजस्थान की राजनीति के कई प्रमुख चेहरे उपस्थित रहे। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, सरकारी मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग और प्रतिपक्ष के मुख्य सचेतक रफीक खान ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। विधायक डॉ. गोपाल शर्मा, चंद्रभान सिंह आक्या, कैलाश वर्मा, गुरवीर सिंह और डॉ. शिखा मील बराला भी इस अवसर पर मौजूद थे। राजस्थान विधान सभा के प्रमुख सचिव भारत भूषण शर्मा ने कार्यक्रम के सफल संचालन में मुख्य भूमिका निभाई। लोकसभा के प्राइड कार्यक्रम के निदेशक राजकुमार और कार्यक्रम निदेशक के.एम. चतुर्वेदी ने 37वें प्रशिक्षण कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा और इसके वैश्विक महत्व की जानकारी दी। अंत में भूटान की नेशनल असेंबली सचिवालय की विधायी अधिकारी सुश्री फूर्पा डेमा ने सभी की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने राजस्थान विधान सभा की मेजबानी और यहाँ से मिले विधायी अनुभवों की जमकर सराहना की। यह आयोजन अंतरराष्ट्रीय विधायी सहयोग और ज्ञान के आदान-प्रदान की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ है।
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