नई दिल्ली | 1 अप्रैल से स्कूलों का नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने जा रहा है। इसके साथ ही बाजारों में कॉपी-किताबों की दुकानों पर अभिभावकों की भारी भीड़ उमड़ रही है।
लेकिन क्या आपने सोचा है कि इन किताबों का बोझ आपके बच्चे के कंधों के लिए कितना घातक है? आजकल छोटे-छोटे बच्चे 12 से 15 किलो तक का भारी-भरकम बैग ढो रहे हैं।
यह भारी वजन न केवल बच्चों की थकान का कारण बनता है, बल्कि उनकी कोमल हड्डियों और विकसित हो रही रीढ़ के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर रहा है।
बस्ते का बोझ, बच्चों की आफत: भारी स्कूल बैग से झुक रही बच्चों की रीढ़, डॉक्टर्स ने दी स्लिप डिस्क और स्कोलियोसिस जैसी गंभीर बीमारियों की चेतावनी
1 अप्रैल से नया सेशन शुरू हो रहा है, लेकिन भारी स्कूल बैग बच्चों की कोमल हड्डियों के लिए खतरा बन रहे हैं। डॉक्टर्स के अनुसार, इससे स्लिप डिस्क और रीढ़ की हड्डी टेढ़ी होने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
HIGHLIGHTS
- स्कूल बैग का वजन बच्चे के शरीर के वजन के 10-15 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
- एक शोध के अनुसार, 52 प्रतिशत बच्चों को भारी बैग के कारण लोअर बैक पेन की समस्या होती है।
- भारी वजन के कारण बच्चों में स्कोलियोसिस यानी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी होने का खतरा बढ़ जाता है।
- डॉक्टर्स के मुताबिक, 12 से 15 किलो का बैग बच्चों के सही पोस्चर और शारीरिक विकास को रोक रहा है।
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क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?
रिसर्च के अनुसार, स्कूल बैग का वजन बच्चे के कुल वजन के 10-15 प्रतिशत से अधिक होने पर पीठ दर्द और पोस्चर बिगड़ने की समस्या शुरू हो जाती है।
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी बताती है कि 52 प्रतिशत बच्चों को भारी बैग की वजह से लोअर बैक पेन होता है, जो भविष्य में क्रॉनिक बन सकता है।
भारत में हुए सर्वे दिखाते हैं कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चे अपनी क्षमता से दोगुना बोझ ढोते हैं। इससे उनकी रीढ़ की हड्डी विकृत या टेढ़ी हो सकती है।
डॉक्टर्स की गंभीर चेतावनी
दिल्ली के अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के डॉ. निपुण बजाज बताते हैं कि बच्चों के बैग का वजन अब एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। ग्रोथ फेज में इतना बोझ हड्डियों को कमजोर कर देता है।
डॉ. बजाज के अनुसार, रोजाना भारी वजन उठाने से बच्चा आगे झुककर चलने लगता है। इससे रीढ़ की प्राकृतिक बनावट यानी स्पाइनल कर्वेचर बदलने लगता है, जो बेहद खतरनाक है।
लंबे समय तक ऐसी स्थिति रहने से बच्चों में स्लिप डिस्क और स्कोलियोसिस (रीढ़ का टेढ़ा होना) जैसी ऑर्थोपेडिक समस्याएं हो सकती हैं। यह दर्द उनकी पढ़ाई और खेलकूद को भी प्रभावित करता है।
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शारीरिक विकास पर बुरा असर
ऑर्थो सर्जन डॉ. हिमांशु त्यागी का कहना है कि 5 से 15 साल की उम्र हड्डियों के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस दौरान रीढ़ की हड्डी काफी लचीली होती है।
जब बच्चा अपनी क्षमता से अधिक वजन उठाता है, तो उसकी लंबाई की ग्रोथ पर भी असर पड़ सकता है। लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को अब गर्दन और पीठ में दर्द की शिकायत रहती है।
अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के बैग के वजन की नियमित जांच करें। स्कूलों को भी चाहिए कि वे लॉकर की सुविधा दें ताकि बच्चों को सारी किताबें घर न ले जानी पड़ें।
बच्चों का बचपन किताबों के बोझ तले न दबे, इसके लिए सही पोस्चर और हल्के बैग का चुनाव करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।
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