नई दिल्ली | वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़े उलटफेर के तहत भारत ने मई 2024 में अपने डीजल निर्यात की दिशा पूरी तरह बदल दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और यूरोपीय प्रतिबंधों के बीच, भारत ने यूरोप को डीजल भेजना लगभग बंद कर दिया और अपना पूरा ध्यान अफ्रीका पर केंद्रित कर दिया है।
डीजल डिप्लोमेसी: भारत ने यूरोप को ठेंगा दिखाया, 83% डीजल अफ्रीका भेजा
मई में भारत का डीजल निर्यात पूरी तरह बदला। यूरोप को जीरो शिपमेंट, जबकि अफ्रीका को रिकॉर्ड 83% सप्लाई हुई।
HIGHLIGHTS
- मई 2024 में भारत के कुल डीजल निर्यात का 83% हिस्सा अकेले अफ्रीकी देशों को गया।
- यूरोपीय संघ को एक भी बैरल डीजल का निर्यात नहीं किया गया, जो एक बड़ा नीतिगत बदलाव है।
- इस बदलाव का मुख्य कारण EU का रूसी तेल पर प्रतिबंध और मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव है।
- डीजल के साथ-साथ पेट्रोल के निर्यात में भी लगभग 40% की भारी गिरावट दर्ज की गई।
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एनर्जी कार्गो ट्रैकर कंपनी कैपलर (Kpler) के आंकड़ों ने इस बड़े बदलाव का खुलासा किया है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि कैसे भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक व्यापार मार्गों को फिर से परिभाषित कर रहे हैं।
अफ्रीका बना भारत के डीजल का सबसे बड़ा खरीदार
आंकड़ों के अनुसार, मई में भारत ने कुल 3.94 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) डीजल का निर्यात किया। इसमें से एक बड़ा हिस्सा, लगभग 3.27 लाख बैरल प्रतिदिन, अफ्रीकी देशों को भेजा गया।
यह भारत के कुल डीजल निर्यात का लगभग 83 फीसदी है। यह आंकड़ा अप्रैल के 32 फीसदी और फरवरी के 64 फीसदी की तुलना में एक बड़ी छलांग है।
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निर्यात के आंकड़ों में बड़ा फेरबदल
इसके विपरीत, यूरोप, जो कभी भारतीय डीजल का एक प्रमुख बाजार था, को मई में शून्य निर्यात किया गया। यह एक चौंकाने वाला आंकड़ा है जो यूरोपीय संघ की नीतियों के प्रभाव को दर्शाता है।
वहीं, एशियाई बाजारों में भी भारतीय डीजल की मांग में 76% की भारी गिरावट आई, और यह घटकर केवल 40,000 बैरल प्रतिदिन रह गया। बाकी 7% डीजल अन्य छोटे बाजारों में गया।
क्यों बदला ग्लोबल फ्यूल मार्केट का रुख?
इस नाटकीय बदलाव के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय कारक काम कर रहे हैं। एशिया में रिफाइनरियों का बढ़ता उत्पादन, चीन की कमजोर मांग और मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष ने मिलकर यह स्थिति पैदा की है।
कैपलर में रिफाइनिंग के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे के अनुसार, इस बदलाव को समझने के लिए एशिया और मध्य-पूर्व की स्थिति को देखना होगा।
एशिया में रिफाइनरियों का उत्पादन इस महीने बेहतर हुआ है। चीन की क्रूड ऑयल की मांग 10 साल के निचले स्तर पर आ गई, जिससे क्रूड की उपलब्धता दूसरी एशियाई रिफाइनरियों के लिए बढ़ गई।
मध्य-पूर्व का तनाव और ट्रेड ऑप्टिमाइजेशन
मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने व्यापार को अनुकूलित करने का एक नया दौर शुरू किया है।
अफ्रीकी देश, जो पारंपरिक रूप से मध्य-पूर्व से ईंधन खरीदते थे, अब आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण भारत जैसे स्थिर आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख कर रहे हैं।
यूरोप का दरवाजा क्यों हुआ बंद?
यूरोपीय संघ (EU) ने रूसी कच्चे तेल से बने ईंधन के आयात पर सख्त प्रतिबंध लगा रखा है। भारत, जो अपनी रिफाइनरियों के लिए बड़े पैमाने पर रियायती रूसी कच्चा तेल खरीदता है, इस नियम के दायरे में आता है।
इस साल की शुरुआत तक भारत यूरोप को डीजल सप्लाई करने वाला एक प्रमुख देश था, लेकिन EU के प्रतिबंधों ने इस रास्ते को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है।
पेट्रोल निर्यात को भी लगा झटका
डीजल के अलावा, भारत के पेट्रोल निर्यात में भी मई में भारी गिरावट देखी गई। पेट्रोल का निर्यात 40% घटकर 1.73 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि अप्रैल में यह 2.90 लाख बैरल था।
इस गिरावट के दो मुख्य कारण थे। पहला, देश में गर्मियों के कारण पेट्रोल की घरेलू मांग मजबूत बनी रही, जिससे निर्यात के लिए कम मात्रा बची।
दूसरा, रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी जैसी प्रमुख कंपनियों की कुछ उत्पादन इकाइयां रखरखाव के लिए बंद थीं, जिससे कुल उत्पादन प्रभावित हुआ।
कुल मिलाकर, ये आंकड़े दिखाते हैं कि कैसे वैश्विक राजनीति और क्षेत्रीय संघर्ष भारत की ऊर्जा निर्यात रणनीति को नया आकार दे रहे हैं, जिससे अफ्रीका एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार के रूप में उभर रहा है।
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