जालोर | राजस्थान के जालोर जिले के भंवरानी गांव से एक बेहद भावुक और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। यहां एक बुजुर्ग दंपती ने 64 साल तक सुख-दुख में साथ निभाने के बाद अंतिम सफर भी एक साथ ही तय किया।
64 साल का साथ, एक ही दिन थमीं सांसें: जालोर में 64 साल के दांपत्य के बाद दंपती का एक ही दिन निधन
जालोर के भंवरानी गांव में 89 वर्षीय दरगाराम और 90 वर्षीय पुनीदेवी का एक घंटे के अंतराल में निधन हो गया।
HIGHLIGHTS
- जालोर के भंवरानी गांव में 64 साल से साथ रह रहे बुजुर्ग दंपती का एक ही दिन निधन हो गया।
- 90 वर्षीय पुनीदेवी के निधन के ठीक एक घंटे बाद 89 वर्षीय पति दरगाराम ने भी दम तोड़ दिया।
- दोनों का विवाह 27 मार्च 1962 को हुआ था और उन्होंने जीवनभर एक-दूसरे का साथ निभाया।
- अंतिम संस्कार के दौरान पति-पत्नी को गठजोड़े में बांधकर एक ही चिता पर मुखाग्नि दी गई।
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गांव के 89 वर्षीय दरगाराम प्रजापत और उनकी 90 वर्षीय पत्नी पुनीदेवी ने शुक्रवार को महज एक घंटे के अंतराल में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इस घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है।
64 वर्षों का अटूट सफर और अंतिम विदाई
दरगाराम और पुनीदेवी का विवाह 27 मार्च 1962 को हुआ था। तब से लेकर आज तक दोनों ने हर परिस्थिति में एक-दूसरे का हाथ थामे रखा और आदर्श दांपत्य जीवन जिया।
परिजनों के अनुसार, शुक्रवार सुबह पुनीदेवी रोज की तरह उठीं और गायों को रोटी खिलाकर घर लौटी थीं। इसके बाद वह अपने पति दरगाराम के पास बैठकर बातें करने लगीं।
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कुछ समय बातचीत करने के बाद वह घर के अंदर कमरे में गईं, जहां अचानक चक्कर आने से वह जमीन पर गिर पड़ीं और उनकी सांसें हमेशा के लिए थम गईं।
पत्नी के वियोग में पति ने भी तोड़ा दम
जब पोती पिंकी ने कमरे में जाकर देखा तो दादी बेसुध थीं। उसने तुरंत अपने दादा दरगाराम को दादी की मौत की सूचना दी, जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा।
दरगाराम तुरंत कमरे में आए और अपनी जीवनसंगिनी का शव देखकर स्तब्ध रह गए। वह वहीं जमीन पर बैठ गए और गहरे सदमे में चले गए।
इसी बीच उनका बेटा डॉक्टर को बुलाने के लिए भागा, लेकिन डॉक्टर के पहुंचने से पहले ही दरगाराम ने भी दम तोड़ दिया। पत्नी के जाने का दुख वह सहन नहीं कर पाए।
इस तरह पत्नी की मौत के ठीक एक घंटे बाद पति की भी सांसें थम गईं। इस हृदयविदारक घटना से पूरे गांव में मातम छा गया।

अनोखी परंपरा के साथ अंतिम संस्कार
शनिवार सुबह जब दोनों की अंतिम यात्रा निकाली गई, तो परिजनों और ग्रामीणों ने उन्हें एक अनोखी और बेहद भावुक विदाई देने का फैसला किया।
शवों को श्मशान ले जाते समय दोनों को विवाह की तरह फिर से गठजोड़े में बांधा गया। इसके बाद एक पवित्र पेड़ के चारों ओर चार फेरे दिलवाए गए।
64 साल पहले जिस पवित्र रिश्ते की शुरुआत विवाह के फेरों से हुई थी, उसका अंत भी उसी विवाह की रस्मों के साथ हुआ।
एक ही चिता पर पंचतत्व में विलीन
इसके बाद दोनों पार्थिव शरीरों को श्मशान घाट ले जाया गया और एक ही चिता पर सजाया गया। उनके सबसे बड़े बेटे कालूराम ने दोनों को मुखाग्नि दी।
इस अभूतपूर्व और भावुक दृश्य को देखकर श्मशान घाट पर मौजूद सैकड़ों ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं। हर कोई इस सच्चे प्रेम की मिसाल दे रहा था।
दरगाराम और पुनीदेवी अपने पीछे चार बेटों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके परिवार में कुल 18 सदस्य हैं जो आज भी एक साथ रहते हैं।
"दोनों बुजुर्ग पूरी तरह स्वस्थ और सक्रिय थे। उनके अचानक चले जाने से न केवल परिवार बल्कि पूरा भंवरानी गांव गहरे शोक में डूबा हुआ है।" - स्थानीय ग्रामीण गणपतसिंह मंडलावत
सच्चे प्रेम की अनूठी मिसाल
इस बुजुर्ग दंपती की कहानी ने साबित कर दिया कि सच्चा प्रेम केवल जीवन तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि मृत्यु के बाद भी साथ निभाता है।
भंवरानी गांव के लोग अब इस दंपती के अटूट प्रेम, समर्पण और जीवनभर के साथ को एक प्रेरणादायक मिसाल के रूप में याद कर रहे हैं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्तों की नींव आपसी समझ और अटूट विश्वास पर टिकी होती है, जो अंतिम सांस तक अडिग रहती है।
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