खाटूश्यामजी: बसंत पंचमी पर पीला वस्त्र बांटने की खबरों का खंडन, जानें क्या है बाबा श्याम की विशेष परंपरा

बसंत पंचमी पर पीला वस्त्र बांटने की खबरों का खंडन, जानें क्या है बाबा श्याम की विशेष परंपरा
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Highlights

  • मंदिर कमेटी ने पीला वस्त्र बांटने की अफवाहों को नकारा,
  • बसंत पंचमी पर होता है बाबा का विशेष श्रृंगार,
  • साल में एक बार बदला जाता है बाबा का अंतःवस्त्र।

खाटूधाम | राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल खाटूश्यामजी में बसंत पंचमी के पावन पर्व पर होने वाले विशेष आयोजन और परंपराओं को लेकर मंदिर कमेटी ने महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। श्री श्याम मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेन्द्र सिंह चौहान ने सोशल मीडिया पर चल रही उन खबरों का पूरी तरह खंडन किया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि बसंत पंचमी के दिन मंदिर में बाबा श्याम का पीला वस्त्र बांटा जाएगा।

चौहान ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई भी परंपरा मंदिर में नहीं है और न ही ऐसा कोई कार्यक्रम निर्धारित है। उन्होंने भक्तों से भ्रामक खबरों पर ध्यान न देने की अपील की है। हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि बसंत पंचमी के अवसर पर बाबा श्याम का पीले फूलों से भव्य श्रृंगार किया जाएगा और विशेष अनुष्ठान संपन्न होंगे।

बसंत पंचमी का विशेष महत्व
बसंत पंचमी का दिन श्याम भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन देशभर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु खाटूधाम पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन बाबा श्याम के शीश का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात उन्हें पीले रंग के वस्त्र धारण करवाए जाते हैं और पीले फूलों से मनमोहक श्रृंगार किया जाता है। भक्त लखदातार के इस मनोहारी रूप का दर्शन करने के लिए विशेष रूप से प्रतीक्षा करते हैं।

साल में एक बार बदलता है अंतःवस्त्र
बाबा श्याम के श्रृंगार से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा उनके अंतःवस्त्र को बदलने की है। बाबा श्याम एक केसरिया रंग का अंतःवस्त्र धारण करते हैं, जिसे साल में केवल एक बार बसंत पंचमी के दिन ही बदला जाता है। यह वस्त्र बिना सिलाई वाला और साधारण होता है, जिसकी लंबाई लगभग डेढ़ से दो मीटर होती है। पूरे वर्ष बाबा इसी वस्त्र को धारण किए रहते हैं और केवल इसी विशेष दिन इसे बदला जाता है।

पौराणिक संदर्भ और महिमा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, खाटूश्यामजी को भगवान श्रीकृष्ण का कलयुगी अवतार माना जाता है। महाभारत काल में भीम के पौत्र बर्बरीक ने धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश भगवान कृष्ण को दान कर दिया था। उनकी इस महान कुर्बानी से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था कि वे कलयुग में 'श्याम' के नाम से पूजे जाएंगे और हारने वालों का सहारा बनेंगे। आज भी भक्त 'हारे के सहारे' के जयकारों के साथ बाबा के दरबार में अपनी हाजिरी लगाते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

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