नई दिल्ली | केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने महिला सशक्तिकरण को विकसित भारत के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बताया है।
विकसित भारत का केंद्र: महिला सशक्तिकरण: महिला सशक्तिकरण विकसित भारत के निर्माण का केंद्र: डॉ. मांडविया
महिला श्रम भागीदारी 23.3% से बढ़कर 40% हुई, गिग वर्कर्स को मिली पहचान।
HIGHLIGHTS
- महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) 2017-18 के 23.3% से बढ़कर 2025 में 40% तक पहुंच गई है।
- सामाजिक सुरक्षा कवरेज में तीन गुना विस्तार हुआ है, जो 2015 के 19% से बढ़कर 2025 में 64.3% हो गया है।
- नई श्रम संहिताओं के तहत गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को पहली बार औपचारिक रूप से कानूनी पहचान मिली है।
- श्रम कानूनों में समान काम के लिए समान वेतन और कार्यस्थल पर शिशुगृह जैसी सुविधाओं का अनिवार्य प्रावधान किया गया है।
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उन्होंने कहा कि कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी न केवल एक सामाजिक आवश्यकता है, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति के लिए अनिवार्य है।
डॉ. मांडविया ने यह विचार स्विगी द्वारा आयोजित 'स्विगस्त्री: सेलिब्रेटिंग वुमेन ऑन द मूव' कार्यक्रम के दौरान साझा किए, जहां महिला डिलीवरी पार्टनर्स को सम्मानित किया गया।
महिला श्रम भागीदारी में ऐतिहासिक उछाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुले हैं, जिससे रोजगार संकेतकों में व्यापक सुधार हुआ है।
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आंकड़ों के अनुसार, महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) वर्ष 2017-18 के 23.3 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 40 प्रतिशत हो गई है।
इसी अवधि के दौरान, महिला श्रमिक जनसंख्या अनुपात (FWPR) भी 22 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 39 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है।
एक अन्य सकारात्मक पहलू यह है कि महिला बेरोजगारी दर (FUR) में भारी गिरावट आई है और यह 5.6 प्रतिशत से घटकर 3.1 प्रतिशत हो गई है।
यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि आज भारत में रोजगार की तलाश करने वाली महिलाएं पहले के मुकाबले अधिक सफलतापूर्वक काम प्राप्त कर रही हैं।
गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को नई पहचान
डॉ. मांडविया ने पिछले वर्ष नवंबर में लागू की गई चार नई श्रम संहिताओं के माध्यम से लाए गए क्रांतिकारी सुधारों पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने बताया कि सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को औपचारिक रूप से कानूनी मान्यता दी गई है।
इस सुधार के चलते अब लाखों गिग वर्कर्स, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं, सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ गए हैं।
मंत्री ने जोर देकर कहा कि नई संहिताओं में 'समान काम के लिए समान वेतन' का सिद्धांत पूरी तरह से निहित और अनिवार्य बनाया गया है।
यह कदम लिंग के आधार पर होने वाले वेतन भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में भारत का एक ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय है।
सामाजिक सुरक्षा कवरेज में अभूतपूर्व विस्तार
भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायरा पिछले एक दशक में लगभग तीन गुना बढ़ गया है, जो नीतिगत सुधारों की सफलता का प्रमाण है।
वर्ष 2015 में जहां सामाजिक सुरक्षा कवरेज केवल 19 प्रतिशत था, वहीं वर्ष 2025 में यह बढ़कर 64.3 प्रतिशत से अधिक हो गया है।
डॉ. मांडविया के अनुसार, यह उपलब्धि निरंतर श्रम सुधारों, डिजिटल समावेशन और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम है।
श्रम संहिताओं में घर से काम करने (WFH) के प्रावधान और मातृत्व अवकाश के अधिकारों को भी विशेष रूप से प्राथमिकता दी गई है।
साथ ही, कार्यस्थलों पर शिशुगृह (क्रैच) सुविधाओं की स्थापना को अनिवार्य बनाकर महिलाओं के लिए कार्यबल में बने रहना आसान बनाया गया है।
गिग इकोनॉमी और महिला सशक्तिकरण
गिग और प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार महिलाओं को समय की लचीलापन प्रदान करते हैं, जिससे वे अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार काम कर सकती हैं।
मंत्री ने स्विगी की महिला डिलीवरी पार्टनर्स की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे सामाजिक बाधाओं को तोड़कर आर्थिक स्वावलंबन की नई कहानी लिख रही हैं।
"महिला डिलीवरी सहयोगी न केवल अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रही हैं, बल्कि वे सामाजिक प्रगति की वाहक बनकर भावी पीढ़ियों को प्रेरित कर रही हैं।"
डॉ. मांडविया ने कहा कि ऐसी महिलाएं भारत के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में अपनी बहुमूल्य भूमिका निभा रही हैं।
कार्यक्रम के दौरान उन महिलाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने असाधारण साहस दिखाते हुए विपरीत परिस्थितियों में अपने परिवार को सहारा दिया है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
महिला सशक्तिकरण के ये प्रयास भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति में सबसे बड़ी शक्ति साबित होंगे।
सरकारी नीतियों और निजी क्षेत्र की भागीदारी के मेल से आज भारत की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं।
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