यह तुम्हीं हो? कहीं धोखा तो नहीं खा रहे हम? कहीं आंखों की बीनाई रुखसत तो नहीं हो रही हमसे?
मिथिलेश के मन से: यह तुम्हीं हो? कहीं धोखा तो नहीं खा रहे हम?
आंखें देख नहीं पा रहीं, आवाज़ देने पर भी दिमाग का क्रोनोमीटर उसे बता नहीं पा रहा कि यह मिथिलेश है जिसके साथ उसने दर्जनों तवील रातें और सैकड़ों सख्तजान दिन काटे हैं और जिससे उसका रिश्ता लगभग पचास साल पुराना है।
HIGHLIGHTS
- कुछ बोलो तो, न हो तो गाली ही दो। हम बहुत देर से पहुंचे हैं तुम्हारे पास
- माफ करना दोस्त, तुम्हें देख कर हम भीतर तक दहल उठे हैं
- तुम्हारी वह जिंदादिली एक मुर्दा खामोशी में तब्दील क्यों हो रही?
- यह तुम्हीं हो? कहीं धोखा तो नहीं खा रहे हम?
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सच यही है कि हम दुरुस्त हैं। कुछ भी ऐसा नहीं है जो चौंकाये या हमें देखते हुए सामने वाला बेसाख्ता पूछ बैठे- यह है कौन?
लेकिन तुम्हारे साथ इसके ठीक उलट हुआ है मिंटू। तुम न ठीक से देख सकते हो और न आवाज़ पर हम जैसों को बेझिझक पहचान सकते हो। पहचानते तो जुमले जरूर उछालते: तुम बचे हो अभी?
हम त बुझलीं कि तू मर- बिला गइले। फिर बीस गालियां। फिर बीस किस्से: हऊ बीया कि मरि गइल रेs। मरिये गइल होई। तोरि साथे रहे खातिर मरहीं के पड़ी।
आधी खड़ी बोली, आधी भोजपुरी में धुआं उड़ाये रहता वह और हम उसकी हथेली दबाते रहते कि थोड़ा लिहाज करो। यह घर है, तुम्हारा ही सही। घर में बच्चे भी होंगे। सुनेंगे तो क्या सोचेंगे?
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मिंटू लिहाज नहीं करता। वह बोले तो फिर सुनना ही है, चाहे वह हवा हो चाहे सूरज। वही मिंटू आज हमारे सामने है और डबडबा रहा है।
आंखें देख नहीं पा रहीं, आवाज़ देने पर भी दिमाग का क्रोनोमीटर उसे बता नहीं पा रहा कि यह मिथिलेश है जिसके साथ उसने दर्जनों तवील रातें और सैकड़ों सख्तजान दिन काटे हैं और जिससे उसका रिश्ता लगभग पचास साल पुराना है।
मिंटू यानी रुद्रप्रताप यानी भीटी वाला रुद्रप्रताप जो इंटरमीडिएट में मऊ में हमारे साथ रहा और फिर बीए में भी। उसके बाद दोनों की राहें जुदा हो गयीं। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश का वही मऊ है जिसने हमें जवान होते देखा था।
डार्विन की जुबान में कहें तो बंदर से आदमी बनते।
जब हम दिल्ली से चले तो बार- बार तुम्हारा ध्यान आया। कुछ दोस्त हमें पहले भी बार- बार समझाते रहे हैं कि मऊ जाओ तो मिंटू से जरूर मिलना। वह तुम्हें बहुत याद करता है। कहता है- ऊ साला कब आयी?
भेंट हो पायी का ओसे? बुझात त नइखे। सो, हम तुम्हारे सामने हैं मिंटू। तुम्हारी सारी दुष्टताओं से प्यार करते हुए। हम तुम्हारी तमाम लमतरानियां सुनेंगे। मिंटू! तुम बोलते क्यों नहीं?
कुछ बोलो तो, न हो तो गाली ही दो। हम बहुत देर से पहुंचे हैं तुम्हारे पास। माफ करना दोस्त, तुम्हें देख कर हम भीतर तक दहल उठे हैं। तुम्हारी वह जिंदादिली एक मुर्दा खामोशी में तब्दील क्यों हो रही?
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