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रथ में सवार होकर अपनी मौसी के घर चले तीनों बहन-भाई,  रथ के निर्माण में नहीं होता कील-धातु का प्रयोग

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भक्त बड़े उत्साह के साथ भगवान के बड़े रथों को बारी-बारी से खींचते हुए लगभग ढाई से तीन किलोमीटर की दूरी तय करके गुंडिचा मंदिर तक पहुंचते हैं, जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का निवास माना जाता है। 

HIGHLIGHTS

  1. 1 भक्त बड़े उत्साह के साथ भगवान के बड़े रथों को बारी-बारी से खींचते हुए लगभग ढाई से तीन किलोमीटर की दूरी तय करके गुंडिचा मंदिर तक पहुंचते हैं, जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का निवास माना जाता है। 
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Jagannath Rath Yatra 2023

पुरी | Jagannath Rath Yatra 2023: ओडिशा के पवित्र शहर पुरी में आज भगवान जगन्नाथ जी की वार्षिक रथ यात्रा निकाली जा रही हैं।

भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भी गुंडिचा यात्रा पर निकले हैं। 

रथ पर सवार करने से पहले भगवान की मंगला आरती हुई और खिचड़ी का भोग लगाया गया। 

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को देखने के लिए 25 लाख श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है। ऐसे में रथयात्रा को लेकर पुरी में भारी सुरक्षा बंदोबस्त किए गए हैं। 

रथ में सवार होकर अपनी मौसी के घर जाते हैं भगवान

भक्त बड़े उत्साह के साथ भगवान के बड़े रथों को बारी-बारी से खींचते हुए लगभग ढाई से तीन किलोमीटर की दूरी तय करके गुंडिचा मंदिर तक पहुंचते हैं, जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का निवास माना जाता है। 

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर में सात दिनों तक रहेंगे। 

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष के दसवें दिन जो 28 जून को पड़ेगा तब भगवान वापस अपने मंदिर में वापस लौटेंगे। 

सोने की झाड़ू से होती है रथ के मंडप की सफाई

रथयात्रा के लिए भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के लिए अलग-अलग तीन रथ तैयार किए जाते हैं।

जब तीन प्रतिमाओं को रथ पर विराजमान कर दिया जाता है तब पुरी के राजा एक पालकी में आते हैं और पूजा-पाठ करते हैं।

रथयात्रा शुरू करने से पहले सोने की झाड़ू से रथ मंडप की सफाई की जाती है। इसे छर पहनरा कहा जाता है।

झाड़ू लगाने के बाद मंत्रोच्चारण के साथ शुभ मुहूर्त में ढोल, नगाड़े, तुरही और शंख ध्वनि के साथ भक्त अपने भगवान के रथों को खींचते हैं और पुण्य कमाते हैं। 

तीनों भाई-बहन के अलग रथ

ओडिशा में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा एक महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहार है जो लाखों भक्तों को आकर्षित करता है। रथयात्रा के लिए तीनो भाई-बहन के लिए अलग-अलग रथ तैयार किए जाते हैं। 

भगवान बलभद्र का रथ: भगवान बलभद्र को महादेवजी का प्रतीक माना गया है। रथ का नाम तालध्वज है। ये रथ लाल-हरे रंग का और 13.2 मीटर ऊंचा व 14 पहियों का होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली हैं।

माता सुभद्रा का रथ:  माता सुभद्रा का रथ देवी दुर्गा का प्रतीक होता है। देवी सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। ये लाल और काले रंग का होता है। जिसकी ऊंचाई 12.9 मीटर होती है। रथ के रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहा जाता है।

भगवान जगन्नाथ का रथ: भगवान जगन्नाथ का रथ 16 पहियों और 832 लकड़ी के टुकड़ों से बना होता है। इसकी ऊंचाई 13 मीटर तक होती है और रंग लाल व पीला होता है।

भगवान जग्गनाथ का रथ गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष के नाम से जाना जाता हैं।

रथ की ध्वजा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाती है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ नाम से जानी जाती है। भगवान जगन्नाथ रथ के रक्षक पक्षीराज गरुड़ हैं।

रथ के निर्माण में नहीं होता किसी भी कील-धातु का प्रयोग

भगवान जग्गनाथ, बलभद्र व सुभद्रा माता को बड़े ही नियम कायदों से तैयार किया जाता है। 

रथ नीम की पवित्र और परिपक्व लकड़ियों से बनाये जाते हैं। इनमें किसी भी प्रकार की कील या कांटे या अन्य किसी धातु का प्रयोग नहीं होता है।

रथों को बनाने में दो महीने का समय लगता है। जब तक रथ बनकर तैयार नहीं हो जाते तब तक कारीगर वहीं रहते हैं और सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। 

अहमदाबाद में देश की दूसरी सबसे बड़ी रथयात्रा
 
ओडिशा के पुरी में होने वाली रथयात्रा के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी रथयात्रा अहमदाबाद के जमालपुर स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में निकाली जाती है। 

यहां गृह मंत्री अमित शाह ने अपने परिवार के साथ मंगला आरती के साथ उत्सव की शुरुआत की। 

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