जो भी जाता है, अपने साथ एक युग भी लिये जाता है। पंकज उधास गये तो युग गया, अमीन सयानी गये तो युग गया, जगजीत गये तो युग गया, प्रेमचंद, निराला, महादेवी, वीरेन डंगवाल गये तो युग गया।
हम आज तक नहीं समझ पाये कि युग की समयावधि क्या होती है और उसके एक्सपायर होने की घंटी तभी क्यों बजती है जब कोई चीन्हा और ज़िम्मेदार चेहरा हमारे बीच से रुखसत होता है?
युग को अपना काम करने दो दोस्तो! उसे भी जीने दो। सांस लेने दो। चहकने दो। आदमी के साथ उसे भी क्यों मर जाना चाहिए? अब बात पंकज उधास की क्योंकि युग इस दफा उन्हीं के साथ स्मतिशेष हुआ है।
पंकज उधास कितने बड़े या छोटे गायक थे, हम इस चीरफाड़ में नहीं जाएंगे। लेकिन वह लोकप्रिय गायक थे, इसमें दो राय नहीं हो सकती। ' चिट्ठी आयी है, वतन से चिट्ठी आयी है' को उन्होंने स्वर दिया और यह वाकई कमाल का गीत है। एक हद तक सर्वग्राही भी। यह गीत रुलाता है, खास तौर पर उन लोगों को जिन्हें अपनी हैसियत बदलनी थी और इस चाह ने उन्हें अपने वतन, अपनी मिट्टी से जुदा कर दिया।