इसलिए शिक्षक दिवस पर कोई टीचर-फटीचर नहीं, उस जुनून को सलाम जो भीतर से पैदा होता है और जो उम्र भर हमारे साथ चलता है। कर सकें तो दुआ करें कि यह जुनून बचा रहे।
मेरी टिप्पणी चुभ गयी कुछेक लोगों को। वह टिप्पणी टीचर्स डे के मद्देनजर मैंने डाली थी और वह बहुत मुख्तसर सी टिप्पणी थी।
उस टिप्पणी का मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं था। मेरा बहुत साफ तौर पर मानना है कि जब और जिस भी पल आप गुरुडम की परंपरा में भरोसा करने लगते हैं, एक और गुलामी आपको अपनी गिरफ्त में ले लेती है।
गुलामी अपने आचरण, अपनी रूप- सज्जा में चाहे जैसी भी हो- वह आपको हर हाल में बांधती है। हम इस दुनिया में बंधने नहीं आये। हम आजाद होने आये हैं। हम निर्बंध होने आये हैं। मानव जाति का इतिहास आजादी की वह रूदाद है जो सदियों से कही, सुनी और लड़ी जाती रही है और इसके बीजतत्व हम सबमें हैं।