मैं सन्नाटे का छंद हूं
'लोहे के पंख' जैसा उपन्यास हिन्दी को देने के बावजूद जो राजनीति का शिकार हो गया, जो दाने-दाने को तरस गया, जिसे लोग भूल चुके और जो हर रोज मर रहा था-
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'लोहे के पंख' जैसा उपन्यास हिन्दी को देने के बावजूद जो राजनीति का शिकार हो गया, जो दाने-दाने को तरस गया, जिसे लोग भूल चुके और जो हर रोज मर रहा था-
अरुण रंजन जैसा पत्रकार इस तकलीफदेह बीमारी में भला क्या सोचेगा? क्या सोच सकता है? वह सोच रहा होगा:इतने दीवाने कहां से मेर...
सरसों के फूलों से भर देता हूं आंचल यह पीलापन रखना याद लो ऐसी वेला के लिए तुम्हें देता हूं मौसम का पहला उन्माद।।