मिथिलेश के मन से : मैं सन्नाटे का छंद हूं

मैं सन्नाटे का छंद हूं
मैं सन्नाटे का छंद हूं
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'लोहे के पंख' जैसा अद्भुत उपन्यास हिन्दी को देने के बावजूद जो साहित्य और प्रकाशकों की राजनीति का शिकार हो गया, जो दाने-दाने को तरस गया, जिसे लोग भूल चुके थे और जो हर रोज मर रहा था-

हम अरुण रंजन के घर से लौट रहे हैं और यह कविता हमारा पीछा कर रही है:  'शब्द में मेरी समाई नहीं होगी/ मैं सन्नाटे का छंद हूं।' अज्ञेय की कविता है यह जिन्होंंने एक से एक बेहतरीन कवियों को अपने 'सप्तक' कुनबे में शामिल किया। किया ही नहीं, उनकी पहचान और उनकी मकबूलियत के लिए लड़े भी। 

अपने तमाम अभिजात्य, अपनी तमाम शिष्टताओं, अपने तमाम अंतर्विरोधों और खुद के लिए गढ़े तमाम प्रोटोकाल के बावज़ूद। उनके सप्तक कुनबे मे़ं मुक्तिबोध भी मिलेंगे, रामविलास शर्मा भी, गिरिजा कुमार माथुर भी और विजयदेव नारायण साही भी। वहां केदारनाथ सिंह भी दिख जाएंगे और श्रीकांत वर्मा भी। 

- कोई कविता, कोई रचना, किसी भी क्राफ्ट या किसी भी ज़ुबान की... प्राणवान कब होती है?

- जब वह परकाया प्रवेश की राह चुनती है। जब उसमें परकाया प्रवेश का मेटल होता है। अन्तर्निहित (इनबिल्ट) मेटल।

सत्तर से लेकर नब्बे तक के दशक के अगियाबैताल पत्रकार और संपादक रहे अरुण रंजन को देखते हुए बार-  बार ऐसा क्यों लगा कि अज्ञेय ढोल- मंजीरे के साथ खड़े हैं और बोलते कुछ नहीं... और सुनायी सब दे रहा है... 'मैं सन्नाटे का छंद हूं'.।

यही स्थिति अरुण रंजन की है। सेक्टर 26, नोएडा में वह इन दिनों मुकीम हैं। पहले पटपड़गंज में हुआ करते थे वह। हम सोच रहे कि नोएडा वाले उस घर में अरुण रंजन की जगह कोई और तो नहीं बैठा था? 

इतना सन्नाटा? अरुण रंजन का होना हर हाल में सन्नाटे का निषेध करता है। ना..  यह अरुण रंजन नहीं हो सकते।  हकीकत बिल्कुल उलट। यह अरुण रंजन ही हैं। अज्ञेय की कविता को परकाया प्रवेश मिला है यहां: 'मैं सन्नाटे का छंद हूं।'

हम लौट रहे हैं। थोड़ी देर में हम प्रेस क्लब में होंगे। देश भर के चीन्हे- अचीन्हें, कुछ ज़रूरी, कुछ वैगाबांड  पत्रकारों के बीच। हम वहां खाना खायेंगे। हो सकता है, और भी कुछ करें। अमृतपान भी?

हो सकता है। कुछ भी हो सकता है। मस्ती का आलम हमारे साथ है लेकिन एक गहन उदासी के बीच। यह द्वंद्व थोड़ा जटिल है। इस द्वंद्व को समझना होगा। आप एक साथ ही उदास भी हों और अलमस्त भी, ऐसी ज़ेह्नी कैफियत आम तौर पर नहीं मिलती। लेकिन हमारी है तो है।

प्रेस क्लब में बोलता कोई नहीं किसी से। न जुगरान बोल रहा, न रंजन और न हम। लेकिन मस्ती है। सन्नाटे का निषेध होगा। यह बैठकी पूर्ववर्ती अरुण रंजन की अलामत का सबूत है। सन्नाटा टूटना ही चाहिए। संवाद होना ही चाहिए। 

हमारे लिए आज के अरुण रंजन से ज्यादा उल्लास उस अरुण रंजन से मिल कर हुआ जो पत्रकार कम और ऐक्टिविस्ट ज्यादा था। 

खबर आयी नहीं कि भागो रे भागो। नाकदार संपादक। खबरें सूंघते चलने वाला जर्नलिस्ट। 

'लोहे के पंख' जैसा अद्भुत उपन्यास हिन्दी को देने के बावजूद जो साहित्य और प्रकाशकों की राजनीति का शिकार हो गया, जो दाने-दाने को तरस गया, जिसे लोग भूल चुके थे और जो हर रोज मर रहा था- उस हिमांशु श्रीवास्तव की याद आती है आपको? नहीं आती होगी। आयेगी भी नहीं। एक पत्रकार या संपादक को किसी हिमांशु श्रीवास्तव से क्या लेना- देना हो सकता है, सिवाय इसके कि वह उसके लिए एक खबर भर है, वह भी गुजर जाने के बाद। खबर छप गयी तो ठीक, न छपी तो भी कोई बात नहीं। 

अरुण रंजन यहीं प्रासंगिक हैं। जब वह पटना में संपादक थे, हिमांशु श्रीवास्तव के बारे में उन्हें खबर मिलती है और वह लगभग बदहवास हाल में केबिन से बाहर निकलते हैं। तुरंत अर्जेंट मीटिंग बुलाते हैं। तुरंत फरमान सुनाते हैं: गुंजन, प्रेमकिरण, नीलाभ, नवेंदु, मिथिलेश! तुम सब जाओ। इसी वक्त जाओ वहां। 

कोई लेखक मर रहा है। उस लेखक से बात करो। हम उसे छापेंगे। किस्तवार छापेंगे। उसकी पुरानी रचनाएं तक छापेंगे। हम उसे इस तरह, इस हाल में मरने नहीं देंगे।' आज रात नहीं सोयेंगे अरुण रंजन। 

कल सुबह किसी भी हाल में वह हिमांशु श्रीवास्तव के पास होंगे। आग अपनी जगह, पानी बचा रहना चाहिए।अरुण रंजन जैसे पत्रकार को आप यहां से देखिए। 

तो दोस्तो! किस्सा कोताह कि तीन साल तक नभाटा, पटना में छपते रहे हिमांशु श्रीवास्तव और उनका पेमेंट नगदी में जाता रहा क्योंकि किसी बैंक में उनका खाता नहीं था। रहा भी होगा तो डेड हो चुका होगा। 
( क्रमश:)

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