बाड़मेर | राजस्थान के बाड़मेर जिले में औद्योगिक विकास और स्थानीय अधिकारों के बीच का तनाव एक दुखद मोड़ पर पहुंच गया है। गिरल माइंस के बाहर दो महीने से अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे एक श्रमिक जैसाराम मेघवाल की तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई। इस घटना ने पूरे इलाके में आक्रोश की लहर दौड़ा दी है।
बाड़मेर: धरने पर मजदूर की मौत, MLA भाटी बोले- सिस्टम जिम्मेदार
गिरल माइंस आंदोलन में श्रमिक की मौत से हड़कंप, शिव विधायक रविंद्र भाटी ने प्रशासन पर साधा निशाना।
HIGHLIGHTS
- बाड़मेर के गिरल माइंस में 60 दिनों से धरने पर बैठे श्रमिक जैसाराम मेघवाल की मौत हो गई।
- शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने प्रशासन और माइंस प्रबंधन के उदासीन रवैये को जिम्मेदार ठहराया।
- विधायक भाटी ने पीड़ित परिवार के लिए उचित मुआवजे और एक आश्रित को सरकारी नौकरी की मांग की है।
- आंदोलनकारियों ने मांगें पूरी होने तक और लिखित समझौता होने तक शव उठाने से इनकार कर दिया है।
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जैसाराम की तबीयत धरने के दौरान अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें फौरन जिला अस्पताल ले जाया गया। हालांकि, डॉक्टरों ने उन्हें वहां मृत घोषित कर दिया। इस खबर के फैलते ही स्थानीय लोगों और प्रदर्शनकारियों का गुस्सा फूट पड़ा।
'सिस्टम की भेंट चढ़ा गरीब मजदूर'
घटना की सूचना मिलते ही शिव विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी अपने समर्थकों के साथ जिला अस्पताल की मोर्चरी पहुंचे। उन्होंने पीड़ित परिवार से मिलकर उन्हें सांत्वना दी और इस पूरी त्रासदी के लिए सीधे तौर पर प्रशासन और माइंस प्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया।
विधायक भाटी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा, जो तेजी से वायरल हो गया। उन्होंने इस घटना को प्रशासनिक संवेदनहीनता का चरम बताया।
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आज प्रशासन के पूरी तरह से तानाशाही और संवेदनहीन रवैये के कारण एक गरीब और बेकसूर मजदूर हमारे इस सरकारी सिस्टम की भेंट चढ़ गया।
भाटी ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक पीड़ित परिवार की मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उनकी प्रमुख मांगों में उचित मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर एक ठोस लिखित समझौता शामिल है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद गिरल माइंस परियोजना से जुड़ा है, जिसके लिए स्थानीय किसानों और मजदूरों ने अपनी पुश्तैनी जमीनें दी थीं। इन लोगों का आरोप है कि सरकार और कंपनी ने विकास और रोजगार के जो वादे किए थे, वे कभी पूरे नहीं हुए।
पिछले 60 दिनों से, जैसाराम मेघवाल जैसे कई स्थानीय लोग भीषण गर्मी और धूल के बीच अपनी बुनियादी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण धरना दे रहे थे। उनका कहना था कि उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला और न ही स्थायी रोजगार, जिससे उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
'प्रशासन सोता रहा गहरी नींद'
रविंद्र सिंह भाटी ने अपनी पोस्ट में इस बात पर जोर दिया कि जैसाराम उन लोगों में से थे जिन्होंने देश के विकास के लिए अपनी कीमती जमीनें खुशी-खुशी सरकार को सौंप दी थीं।
उन्होंने लिखा, “विडंबना देखिए कि वही जैसाराम अपनी बेहद वाजिब और बुनियादी मांगों को लेकर पिछले 2 महीने से इस भीषण गर्मी में धरने पर बैठे थे। स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में तब भी सो रहे थे और आज जब एक मासूम की जान चली गई है, तब भी वे चैन की नींद सो रहे हैं।”
इस घटना ने प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद की कमी को उजागर कर दिया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी आवाज को लगातार अनसुना किया जा रहा था, जिसके कारण यह दुखद परिणाम सामने आया।
'और कितने गरीबों की जान लेना बाकी?'
विधायक भाटी ने सरकार और अधिकारियों की अंतरात्मा को झकझोरते हुए कई कड़े सवाल पूछे। उन्होंने अपनी पोस्ट के अंत में व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया।
उन्होंने पूछा, “आखिर इस बहरे और गूंगे सिस्टम को जगाने के लिए और कितने गरीब मजदूरों की जानें लेना बाकी रह गई है? क्या इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक गरीब को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने और हक मांगने का भी अधिकार नहीं है?”
जैसाराम मेघवाल की मौत ने गिरल माइंस आंदोलन को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। अब यह केवल स्थानीय अधिकारों की लड़ाई नहीं रही, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ एक बड़ा प्रतीक बन गया है। इस घटना के बाद प्रशासन पर दबाव काफी बढ़ गया है और अब देखना यह होगा कि सरकार प्रदर्शनकारियों की मांगों पर क्या कदम उठाती है।
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