राजस्थान | राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर एक आयोग की रिपोर्ट ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सौंपी गई इस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
OBC रिपोर्ट पर सियासी भूचाल: राजस्थान OBC रिपोर्ट: 92 में से 11 जातियों का दबदबा, गरमाई सियासत
राजस्थान OBC आयोग की रिपोर्ट से सियासत गरमा गई है। 900 पन्नों की रिपोर्ट में 92 में से सिर्फ 11 जातियों के राजनीतिक दबदबे का खुलासा हुआ है, जिसे कांग्रेस ने बांटने की साज़िश बताया है।
HIGHLIGHTS
- राजस्थान OBC आयोग ने 900 पन्नों की रिपोर्ट मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सौंपी।
- रिपोर्ट के अनुसार 92 OBC जातियों में से सिर्फ 11 का राजनीतिक दबदबा है।
- सरकार ने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताया।
- कांग्रेस ने रिपोर्ट को OBC समुदाय को बांटने की एक सोची-समझी साज़िश करार दिया।
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रिपोर्ट में क्या है खास?
राजस्थान OBC राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग ने लगभग 900 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट दो खंडों में सरकार को सौंपी है। इस रिपोर्ट को तैयार करने में आयोग को पंद्रह महीने का समय लगा, जबकि शुरुआत में इसके लिए तीन महीने की समय-सीमा तय की गई थी।
आयोग ने प्रदेश की कुल 92 OBC जातियों का गहन सर्वेक्षण किया। इसमें हर जाति की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का आंकड़ों के साथ मूल्यांकन किया गया है।
11 जातियों का दबदबा
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रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि 92 में से केवल 11 OBC जातियां ही ऐसी हैं, जिनका राजनीति में दबदबा है। इन 11 जातियों के एक हजार से अधिक सदस्य या तो चुनाव लड़ चुके हैं या जनप्रतिनिधि बन चुके हैं। इसके विपरीत, बाकी जातियों की राजनीतिक भागीदारी न के बराबर रही है।
आयोग के अध्यक्ष, सेवानिवृत्त न्यायाधीश मदन लाल भाटी के अनुसार, यह सर्वे 19 पैमानों के आधार पर किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य OBC समुदाय पर व्यापक डेटाबेस तैयार करना था।
सरकार और विपक्ष आमने-सामने
रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने रिपोर्ट का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करने वाला कदम बताया है।
'वन स्टेट, वन इलेक्शन' से जुड़ा मामला
मुख्यमंत्री ने इसे सरकार के 'वन स्टेट, वन इलेक्शन' के विजन से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव एक साथ कराने से बार-बार होने वाले चुनावों के कारण प्रशासनिक कामकाज में बाधा नहीं आएगी और संसाधनों की भी बचत होगी।
वहीं, कांग्रेस ने इस रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे समाज को बांटने की साज़िश करार दिया है।
डोटासरा ने कहा, "अब तक जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार अलग-अलग जातियों को आपस में भिड़ाने की विस्तृत व्यवस्था की गई है। सरकार से किसने कहा था कि इस तरह का जातिगत सर्वे कराए और उसे सार्वजनिक करे?"
उन्होंने आयोग को रिपोर्ट सौंपने में हुई 15 महीने की देरी पर भी सवाल उठाए और कहा कि अगर रिपोर्ट में OBC जातियों के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिश की गई तो कांग्रेस इसका पुरजोर विरोध करेगी।
रिपोर्ट के राजनीतिक मायने
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब राज्य में नगरीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। माना जा रहा है कि 17 अगस्त के आसपास चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रिपोर्ट आने वाले चुनावों में टिकट बंटवारे और सीट आवंटन का एक बड़ा आधार बन सकती है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह रिपोर्ट वास्तव में पिछड़ी जातियों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने में मदद करती है, या यह केवल एक चुनावी हथियार बनकर रह जाती है।
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