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खेल

TC यशवीर ने आखिरी थ्रो में जीता कांस्य, रचा इतिहास

जोगेन्द्र सिंह शेखावत

जयपुर रेलवे के टीसी यशवीर सिंह ने कॉमनवेल्थ गेम्स में आखिरी थ्रो में 85.41 मीटर भाला फेंककर कांस्य पदक जीता। पांच प्रयासों तक पदक की दौड़ से बाहर रहने के बाद उन्होंने बाजी पलट दी।

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HIGHLIGHTS

  • जयपुर रेलवे के टीसी यशवीर सिंह ने कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीता।
  • पांच प्रयासों तक पदक की दौड़ से बाहर रहने के बाद छठे और आखिरी थ्रो में बाजी पलटी।
  • उन्होंने 85.41 मीटर का थ्रो कर अपना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड भी तोड़ा।
  • यशवीर ने पूर्व विश्व चैंपियन और ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता को पीछे छोड़ा।
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जयपुर |

मेहनत और हौसले के दम पर आखिरी मौका भी ऐतिहासिक बन सकता है। जयपुर रेलवे के टिकट क्लर्क (टीसी) यशवीर सिंह ने ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में यह साबित कर दिखाया है।

आखिरी प्रयास में पलटी बाजी, जीता कांस्य

शुरुआती पांच प्रयासों तक पदक की दौड़ से लगभग बाहर हो चुके यशवीर ने अपने छठे और अंतिम प्रयास में सब कुछ बदल दिया।

उन्होंने 85.41 मीटर का शानदार भाला फेंककर न केवल कांस्य पदक अपने नाम किया, बल्कि पूरे मुकाबले का रुख ही पलट दिया।

इस बेहतरीन थ्रो के साथ, उन्होंने अपना पुराना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 83.72 मीटर का रिकॉर्ड भी बेहतर किया।

दिग्गजों को छोड़ा पीछे

यशवीर की यह उपलब्धि इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि उन्होंने पूर्व विश्व चैंपियन एंडरसन पीटर्स और मौजूदा ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अरशद नदीम जैसे बड़े खिलाड़ियों को पीछे छोड़ते हुए पोडियम पर अपनी जगह बनाई।

कॉमनवेल्थ में पदक जीतने के बाद यशवीर ने कहा, "आखिरी थ्रो से पहले मुझे खुद पर पूरा भरोसा था। शुरुआती पांच प्रयास उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, लेकिन मैंने फोकस नहीं खोया। आखिरी मौका था और मैंने अपना पूरा दम लगा दिया।"

पिता से मिली प्रेरणा, रेलवे ग्राउंड से शुरू हुआ सफर

मूल रूप से हरियाणा के भिवानी के रहने वाले यशवीर सिंह का खेल जीवन जयपुर रेलवे कॉलोनी से शुरू हुआ। उनके पिता भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं और जयपुर में पोस्टिंग के कारण उनका परिवार यहीं बस गया।

यशवीर ने बताया कि जैवलिन थ्रो की प्रेरणा उन्हें अपने पिता से ही मिली, जो खुद एक अच्छे जैवलिन खिलाड़ी रह चुके हैं।

पिता ही थे पहले गुरु

उन्होंने कहा, "उन्हें देखकर ही मैंने यह खेल अपनाया। शुरुआती दिनों में उन्होंने ही तकनीक और खेल की बारीकियां सिखाईं।"

रेलवे ग्राउंड में पिता के साथ अभ्यास करते हुए उनके सफर की शुरुआत हुई। पिछले सात वर्षों से वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने के लक्ष्य के साथ लगातार मेहनत कर रहे थे।

चोट के बाद मजबूत वापसी

यशवीर के करियर में एक कठिन दौर भी आया जब एक हादसे में चोट लगने के कारण उन्हें लगभग छह महीने तक खेल से दूर रहना पड़ा।

उन्होंने उस दौर को याद करते हुए कहा, "उस समय काफी निराशा हुई थी, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। रिकवरी पर पूरा ध्यान दिया और खुद से वादा किया कि मजबूत वापसी करूंगा।"

तिरंगा ऊंचा करने का था सपना

यशवीर ने बताया कि पढ़ाई में उनकी ज्यादा रुचि नहीं थी, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वे खेल के जरिए अपना भविष्य बनाएं।

जब उन्होंने नीरज चोपड़ा को भारत के लिए पदक जीतते देखा, तो उन्होंने भी ठान लिया कि एक दिन वह भी देश के लिए मेडल जीतेंगे और तिरंगा ऊंचा करेंगे।

*Edit with Google AI Studio

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