माउंट आबू | राजस्थान के मशहूर हिल स्टेशन माउंट आबू में गौसेवा के दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई नजर आ रही है। यहां का डंपिंग यार्ड अब बेजुबान गायों के लिए मौत का जाल बन चुका है।
माउंट आबू: डंपिंग यार्ड बना गायों का काल, खुली गौसेवा की पोल
माउंट आबू के डंपिंग यार्ड में प्लास्टिक खाती गायें और स्कूल पर मंडराता संकट, प्रशासन बना मूकदर्शक।
HIGHLIGHTS
- माउंट आबू के डंपिंग यार्ड में 50 से अधिक गायें रोजाना प्लास्टिक और कचरा खाने को मजबूर हैं।
- विशेषज्ञों के अनुसार कचरा खाने से गायों में कैंसर और ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
- डंपिंग यार्ड की बदबू के कारण रोटरी स्कूल में छात्रों की संख्या 645 से घटकर 100 से भी कम रह गई है।
- कचरे के ढेर पर भोजन की तलाश में भालू जैसे जंगली जीव भी आ रहे हैं, जिससे उनकी जान को खतरा है।
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डंपिंग यार्ड में गौवंश का संघर्ष
शहर के मुख्य डंपिंग यार्ड में दिनभर 50 से अधिक गायों का झुंड प्लास्टिक और सड़ा-गला कचरा खाते हुए देखा जा सकता है। यह हृदयविदारक दृश्य स्थानीय प्रशासन की लापरवाही और दिखावटी गौसेवा की पोल खोलता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार प्लास्टिक खाने से इन गौवंशों में ट्यूमर और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां विकसित हो रही हैं। स्थानीय लोग प्रशासन और बड़े-बड़े भाषण देने वाले संगठनों की चुप्पी से काफी आहत नजर आ रहे हैं।
स्कूल और बच्चों के भविष्य पर संकट
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रोटरी इंटीग्रेटेड हाई स्कूल की स्थिति भी इस कचरे के ढेर के कारण दयनीय बनी हुई है। पिछले 6 वर्षों से स्कूल प्रबंधन इस डंपिंग यार्ड को आबादी क्षेत्र से दूर हटाने की मांग लगातार कर रहा है।
स्कूल की प्रधानाध्यापिका के अनुसार, कचरे की असहनीय बदबू और प्रदूषित हवा के कारण बच्चों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। यही कारण है कि कभी 645 छात्रों वाला यह स्कूल अब 100 से भी कम छात्रों तक सिमट गया है।
"हमने जिला प्रशासन से लेकर मंत्रियों तक गुहार लगाई, लेकिन हमें केवल खोखले आश्वासन ही मिले हैं। बच्चों और गायों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।" - स्कूल प्रबंधन
वन्यजीवों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल
रात के अंधेरे में यहां भालू जैसे संरक्षित जंगली जानवर भी भोजन की तलाश में कचरे के पास आते हैं। कचरे में मौजूद जहरीली चीजें और प्लास्टिक उनके जीवन के लिए भी एक बड़ा संकट बन गई हैं।
माउंट आबू की यह समस्या अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवता और प्रशासनिक संवेदनशीलता की कड़ी परीक्षा है। क्या प्रशासन इन बेजुबानों की चीख सुनने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
इस डंपिंग यार्ड का समाधान न होना स्थानीय तंत्र की विफलता को दर्शाता है। यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति बेजुबान जानवरों और स्कूली बच्चों के भविष्य के लिए और भी भयावह हो जाएगी।
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