नई दिल्ली |
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर संकट: क्या चुनाव के बाद बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार पर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का भारी दबाव है।
HIGHLIGHTS
- कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार रहने से सरकार पर दबाव बढ़ा है।
- तेल कंपनियों को मौजूदा तिमाही में 50 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है।
- सरकार एलपीजी सिलेंडर पर प्रति यूनिट 600 रुपये की भारी सब्सिडी दे रही है।
- वैश्विक स्तर पर जापान और स्पेन जैसे देशों में ईंधन 30% तक महंगा हुआ है।
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लोकसभा चुनाव संपन्न होते ही मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई है।
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने की संभावना को प्रबल कर दिया है।
हर दिन 1000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महंगे कच्चे तेल और गैस के आयात के कारण देश पर हर दिन लगभग 1000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ रहा है।
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ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर स्थिर बनी हुई हैं। इससे सरकारी खजाने पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है। सीजफायर की उम्मीदें फिलहाल कम नजर आ रही हैं।
सरकार ने अब तक जनता को राहत देने के लिए कीमतों को स्थिर रखा था। लेकिन अब यह इंतजार अर्थव्यवस्था के लिए भारी पड़ता दिख रहा है।
तेल कंपनियों का बढ़ता घाटा
तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी चिंताजनक होती जा रही है। अप्रैल के अंत तक कंपनियों का घाटा 30 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि चालू तिमाही के अंत तक यह घाटा 50 हजार करोड़ रुपये के पार जा सकता है। यह एक गंभीर स्थिति है।
गैस क्षेत्र में भी 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है। इससे कंपनियों के निवेश और संचालन पर असर पड़ रहा है।
"वैश्विक अनिश्चितता और आपूर्ति बाधाओं के बीच ईंधन की कीमतों को लंबे समय तक स्थिर रखना वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।"
एलपीजी पर सब्सिडी का बोझ
सरकार 14 किलोग्राम वाले प्रत्येक रसोई गैस सिलेंडर पर करीब 600 रुपये की भारी सब्सिडी दे रही है। यह जनता के लिए बड़ी राहत है।
उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को मिलने वाली अतिरिक्त राहत ने सरकारी बजट पर दबाव और बढ़ा दिया है।
देश को रोज 20 हजार टन गैस आयात करनी पड़ती है। आने वाले 40 दिनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए महंगे दामों पर गैस खरीदी गई है।
माल ढुलाई और वैश्विक स्थिति
लाल सागर संकट के कारण समुद्री बीमा और जहाजों का किराया काफी बढ़ गया है। जहाजों को अब लंबे रास्तों का उपयोग करना पड़ रहा है।
इससे माल की डिलीवरी में 2 से 3 सप्ताह की देरी हो रही है। परिणामस्वरूप माल ढुलाई खर्च में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
चीन, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने पहले ही ईंधन की कीमतों में 20 से 27 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी है।
जापान और दक्षिण कोरिया में तो पेट्रोल की कीमतें 30 प्रतिशत से भी अधिक महंगी हो चुकी हैं। भारत पर भी इसका असर दिख सकता है।
महंगाई की नई लहर का डर
सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता महंगाई को नियंत्रित रखना है। अगर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर परिवहन पर पड़ेगा।
सब्जियों, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें ट्रांसपोर्टेशन खर्च बढ़ने के कारण बढ़ सकती हैं। इससे आम आदमी की जेब पर दोहरी मार पड़ेगी।
हालांकि, तेल कंपनियों को संकट से बचाने के लिए कीमतों में मामूली वृद्धि करना अब सरकार की मजबूरी बनता जा रहा है।
निष्कर्षतः, सरकार के सामने 'कुआं और खाई' जैसी स्थिति है। एक तरफ महंगाई का डर है तो दूसरी तरफ बढ़ता राजकोषीय घाटा। आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों पर बड़ा फैसला संभव है।
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