आखिर धुर पश्चिम से रवींद्र निकल आए हैं। जितना रोमांचक मुकाबला उससे कई अधिक रोमांचित करने वाली उनकी जीत ।
यह जीत अप्रत्याशित तो नहीं थी पर सशंकित तो हर कोई था चाहे वह समर्थक हों या विपक्षी क्योंकि उनके सामने धूप में धोळे हो चुके बाल थे, शताधिक वर्षों से जनता की आंखों में जमे हुए पार्टी निशान, एक मुश्त वोटों के लिए प्रसिद्ध वोटबैंक और ऐसा संगठन जिसकी कार्यशैली और नेतृत्व पर एकाएक सवाल उठा पाना संभव नहीं, यह नौजवान इन सबसे कैसे निपटेगा? किंतु यह युवक कमाल है!
उनके विरोधी निश्चिंत थे। भाटी के पास भाषण और भीड़ से ज्यादा कुछ है भी नहीं। भाषण को जनता ने अब सीरियस लेना बंद कर दिया है और भीड़ तो विपक्ष की दृष्टि में फर्जी है ही। जिस हिसाब से वह अपने खाने पीने के वेन्यू चेंज करने लगी है, उसका भरोसा करना मुश्किल है।
बाहरी लोग शिव में इकट्ठे होकर गाड़ियां घुमा रहे थे जिसका चुनाव और खासकर जीत से कोई लेना देना नहीं। रही सही कसर बहुकोणीय मुकाबले ने निकाल दी। बड़ी पार्टियां अपनी विरोधी पार्टी के बागी को देखकर खुश होती रही कि फलाने का वोट फलाना बांट लेगा और हम निकल जायेंगे। मुगालते से बुरा रोग दुनिया में कोई नहीं।