इस अधिवेशन को देखें तो साफ तौर पर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस अब 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले ही 2024 के लोकसभा चुनावों की रूपरेखा पर काम करेगी। इसे राहुल गांधी की 2024 से पहले की रीलांचिंग है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कह भी दिया कि राहुल गांधी भारत के प्रधानमंत्री बने, हम सबकी यह इच्छा है और इसी को क्रियान्वित करने की दिशा में कांग्रेस काम कर रही है।
राहुल गांधी वैसे तो कांग्रेस का अध्यक्ष खर्गे को बताते हैं, लेकिन लास्ट में उन्हें निर्देश भी दे डाला कि भारत जोड़ो यात्रा जैसी और प्लानिंग की जाए। इससे पहले राहुल ने पार्टी को तपस्वियों की पार्टी भी कहा है। यह पुजारियों की पार्टी नहीं है कहते हुए राहुल ने आरएसएस बीजेपी पर भी निशाना साधा।
इससे पहले कांग्रेस ने रायपुर में अपने 85वें पूर्ण अधिवेशन के दौरान पार्टी संविधान में कई संशोधनों को मंजूरी दी और कई कानून प्रस्तावित किए। कांग्रेस ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों, ओबीसी, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और युवाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण की गारंटी देने वाले एक संशोधन को अपनाया। हालांकि सीडब्ल्यूसी में चयन के लिए चुनाव और एक व्यक्ति एक पोस्ट पर भी कुछ खास असर नजर नहीं आया।
यही नहीं एक परिवार एक टिकट वाला सिद्धान्त भी यहां लागू नहीं हुआ, क्योंकि यह गांधी परिवार पर ही साफ तौर पर लागू होता। हालांकि 1 जनवरी को अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने मीडिया से कहा था कि "कांग्रेस के संविधान के अनुसार, पूर्ण सत्र के साथ सीडब्ल्यूसी का चुनाव भी होगा।"
परन्तु अब पार्टी ने यू टर्न ले लिया है। क्योंकि यदि चुने गए लोगों में ऐसे लोगों का बहुमत हो गया जो मल्लिकार्जुन खड़गे की हर बात मानने को तैयार ना हों तो फिर गांधी परिवार के फैसलों पर ही संकट आ जाएगा।
अब अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे को सभी 23 सदस्यों और शायद 35 सदस्यों को नामित करने की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया। इस प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी 35 टीम चुनने के लिए व्यापक अधिकार दिए गए हैं।
वह केन्द्र की गलतियां ढूंढ रही है, लेकिन अपना विजन धरातल पर नजर नहीं आ रहा। उसके पास तीन राज्यों में सरकार है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हिमाचल में। परन्तु अस्थिरता का आलम पार्टी पर ऐसे गहरे बादलों को ढंके है। जहां उम्मीदों के सूरज की रोशनी पहुंच नहीं पा रही।