जयपुर, 21 दिसम्बर 2025। भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेसवार्ता में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर अरावली पर्वतमाला जैसे गंभीर पर्यावरणीय विषय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार के विरुद्ध भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। राठौड़ ने गहलोत के दावों को दुर्भाग्यपूर्ण और तथ्यात्मक रूप से गलत बताते हुए कहा कि अरावली के संरक्षण और खनन नियमन से जुड़े सभी निर्णय राजनीतिक नहीं, बल्कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट और लिखित आदेशों के तहत लिए गए हैं।
राठौड़ ने विस्तार से बताया कि करीब ढाई अरब साल पुरानी, विश्व की सबसे प्राचीन 700 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वत श्रृंखला की कम से कम 100 मीटर ऊंचाई को ही 'अरावली हिल्स' मानने को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई परिभाषा के संबंध में अशोक गहलोत द्वारा लगाए जा रहे आरोप न तो कानूनी तथ्यों पर आधारित हैं और न ही न्यायिक प्रक्रिया की समझ को दर्शाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मानदंड, जिसके तहत स्थानीय भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची भू-आकृतियों को अरावली का हिस्सा माना जाता है, वास्तव में कांग्रेस शासनकाल में ही तय और लागू हुआ था। इतना ही नहीं, 19 अगस्त 2003 को जिलेवार नक्शे तैयार करने के निर्देश भी तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में ही जारी किए गए थे। वर्षों तक इस परिभाषा को लागू रखने के बाद आज इसे गलत बताना न्यायिक फैसले को राजनीतिक रंग देने का एक स्पष्ट प्रयास है।
राठौड़ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए बताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने दिनांक 20 नवंबर 2025 को अरावली के संरक्षण और खनन नियमन की रूपरेखा तैयार करते हुए अपने आदेश में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेतृत्व में गठित समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया। इस आदेश में यह स्पष्ट किया गया कि अरावली से जुड़े जिलों में स्थित कोई भी ऐसी भू-आकृति जो आसपास के भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो, उसे 'अरावली हिल्स' माना जाएगा। इससे पूर्व भी, 8 अप्रैल 2005 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में 100 मीटर से अधिक ऊँचाई को 'हिल' मानने का मानदंड तय किया गया था, जिसे कांग्रेस सरकारों ने भी वर्षों तक लागू रखा था।
उन्होंने आगे बताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं में अवैध खनन का मुद्दा लंबे समय से चल रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने W.P. (सिविल) संख्या 4677/1985 (एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ और अन्य) और W.P. (C) 202/1995 (टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ) में अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं में अवैध खनन से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हुए, 09.05.2024 को अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की एक समान परिभाषा प्रस्तावित करने के लिए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के सचिवों एवं विशेषज्ञों की एक समिति गठित की थी। इस समिति की रिपोर्ट पर गहन विचार-विमर्श के बाद ही दिनांक 20 नवंबर 2025 को अंतिम निर्णय आया है। इसलिए इसमें किसी भी प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।