बीकानेर कलेक्ट्रेट की तस्वीर और तकनीकी फजीहत
कार्यक्रम के दौरान केवल पांडाल ही खाली नहीं हुआ, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी फजीहत का सामना करना पड़ा। चूंकि यह एक राज्य स्तरीय कार्यक्रम था, इसलिए प्रदेश के सभी जिला मुख्यालय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के माध्यम से जुड़े हुए थे। मुख्यमंत्री के मंच पर लगे बड़े डिस्प्ले में विभिन्न जिलों की लाइव फीड चल रही थी। दोपहर साढ़े तीन बजे के करीब बीकानेर एनआईसी की एक ऐसी तस्वीर स्क्रीन पर उभरी जिसने पांडाल में मौजूद लोगों के बीच चर्चा और गॉसिप को हवा दे दी। बीकानेर कलेक्ट्रेट का वीसी रूम लगभग पूरी तरह खाली था। टेबल पर केवल एक-दो कार्मिक बैठे नजर आए, जबकि शेष कुर्सियां खाली थीं। जब मीडिया के कैमरों की नजर इस पर पड़ी, तो तकनीकी टीम ने आनन-फानन में बीकानेर की फीड हटाकर जालौर एनआईसी को डिस्प्ले पर लगा दिया। यह घटना दर्शाती है कि केवल कार्यक्रम स्थल पर ही नहीं, बल्कि राज्य के अन्य केंद्रों पर भी इस महत्वपूर्ण आयोजन को लेकर उत्साह की कमी थी।
पुलिस अधीक्षक के प्रयास भी रहे विफल
जैसे-जैसे मुख्यमंत्री का भाषण आगे बढ़ रहा था, पांडाल से लोगों का पलायन तेज होता गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सिरोही के पुलिस अधीक्षक (SP) को स्वयं मोर्चा संभालना पड़ा। वह लोगों को रुकने और वापस बैठने के लिए कहते नजर आए, लेकिन जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ। क्या महिलाएं और क्या पुरुष, सभी नदी के रेले की तरह पांडाल छोड़कर बाहर निकल रहे थे। मीडिया के कैमरों को देखकर कुछ अधिकारियों ने फोन कान पर लगाकर खुद को फ्रेम से बाहर करने की कोशिश की, लेकिन खाली होता पांडाल कैमरों में कैद होने से नहीं बच सका।
नेताओं का मोह और कार्यकर्ताओं की अनदेखी
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मंच पर मौजूद मंत्री, विधायक और जिलाध्यक्ष मूकदर्शक बने रहे। आरोप लग रहे हैं कि इन नेताओं का ध्यान जनता को रोकने के बजाय मुख्यमंत्री के साथ मंच साझा करने और अपने करीबियों को सीएम से मिलवाने की सूची में नाम डलवाने पर था। सिरोही भाजपा के पदाधिकारी और नेता अपने उन कार्यकर्ताओं को भी सक्रिय नहीं कर पाए जो गांवों से लाए गए लोगों को संभाल सकें। कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी देखी गई कि सरकार में उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। भाजपा के कुछ पूर्व पार्षदों पर राजकार्य में बाधा के मामले दर्ज होने जैसी घटनाओं ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को पहले ही तोड़ रखा है।
गुटबाजी और नाराजगी का असर
सिरोही में भाजपा के भीतर की गुटबाजी भी इस कार्यक्रम में साफ नजर आई। आबूरोड और माउंट आबू जैसे क्षेत्रों से आए कई वरिष्ठ पदाधिकारियों के नाम मुख्यमंत्री से मुलाकात की सूची में नहीं थे। माउंट आबू के कुछ ऐसे पदाधिकारी, जो पार्टी के लिए हमेशा समर्पित रहे हैं, मायूस होकर कार्यक्रम छोड़कर चले गए। कार्यकर्ताओं का यह भी आरोप था कि सिरोही के नवनियुक्त जिला प्रभारी को वह तवज्जो नहीं मिली जो पूर्व में मदन राठौर जैसे नेताओं को मिलती थी। संगठन के भीतर पदों के वितरण और मुख्यमंत्री के करीब जाने की होड़ ने आम जनता और जमीनी कार्यकर्ता को हाशिए पर धकेल दिया, जिसका परिणाम खाली पांडाल के रूप में सामने आया।
मुख्यमंत्री का संबोधन और कांग्रेस पर प्रहार
तमाम अव्यवस्थाओं के बावजूद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपना संबोधन जारी रखा। हालांकि वह निर्धारित समय से एक घंटा देरी से पहुंचे थे, जिससे लोगों का धैर्य जवाब दे चुका था। मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने बिना नाम लिए कांग्रेस के बड़े नेताओं को चेतावनी दी कि उनके समय में हुए भ्रष्टाचार का पूरा हिसाब किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ लोग उनके बोलने की शैली पर सवाल उठाते हैं, लेकिन वह काम करने में विश्वास रखते हैं। हालांकि, जनता में इस बात को लेकर भी निराशा थी कि मुख्यमंत्री ने स्थानीय स्तर पर कोई बड़ी घोषणा नहीं की। कई महिलाएं यह सोचकर आई थीं कि उनके लिए कुछ विशेष होगा, लेकिन ऐसा न होने पर उन्होंने भाषण के बीच में ही घर वापसी बेहतर समझी।
मीडिया की भूमिका और पीआर टीम का दखल
आजकल बड़े राजनेताओं के साथ उनकी अपनी पीआर और सिक्योरिटी टीम चलती है, जो मुख्य मीडिया को नेताओं के करीब जाने से रोकती है। सिरोही में भी यही हुआ। हवाई पट्टी से लेकर मंच तक पीआर टीम का कब्जा था। ऐसे में मीडियाकर्मियों ने पांडाल के बाहर और दर्शक दीर्घा में जाकर कवरेज करना शुरू किया, जहां उन्हें वास्तविक स्थिति का पता चला। पीआर टीम जहां सब कुछ 'ऑल इज वेल' दिखाने में जुटी थी, वहीं स्वतंत्र मीडिया ने खाली होती कुर्सियों और लोगों की नाराजगी को प्रमुखता से दिखाया। यह घटनाक्रम सबक है कि केवल भीड़ जुटा लेना ही सफलता नहीं है, बल्कि उस भीड़ को बांधे रखना और कार्यकर्ताओं का सम्मान बनाए रखना भी राजनीति का अनिवार्य हिस्सा है।