सरसों के फूलों से भर देता हूं आंचल
यह पीलापन रखना याद
लो ऐसी वेला के लिए तुम्हें देता हूं
मौसम का पहला उन्माद।।
*********************
कमउमरी में दो, सिर्फ दो किताबें पढ़ने को मिल जाएं तो कहना बड़ा मुश्किल है कि आपकी राह क्या होगी।
ज्यादा अंदेशा है कि आप वह निरंकुश प्रेमी/ प्रेमिका हो जाएं जिनका संविधान दुनिया के किसी भी संविधान और आईन को ठेंगे पर रखता है। ये दो किताबें हैं: चरित्रहीन ( शरतचंद्र) और गुनाहों का देवता ( धर्मवीर भारती)।
असर इतना कि आप इन किताबों के पात्रों को जीने लगते हैं। सिर्फ प्रतीकों में नहीं, दैनंदिन जीवन में भी। सच्चीमुच्ची के जीवन में। कभी शरत बाबू के सतीश और उपेंद्र आपकी नींद पर हुकूमत करेंगे तो कभी ' गुनाहों का देवता' की सुधा आपसे पूछ रही होगी: ' बहुत थक गये हो..? मेरे पास आओगे चंदर?'
इन दो किताबों के अलावा एक शै और बेचैन रखती है उस वय में आपको.. और वह है वंशी और मादल की धुनों और पानियों पर नाचते मयूरपंखी गीत जो कहीं से, किन्हीं भी आवारा कंठस्वरों से कभी भी फूट सकते हैं और कहीं भी ले जा सकते हैं आपको। ऐसा ही मादक गीत है वह, जिसका हम ऊपर जिक्र कर चुके हैं।