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राजस्थान

राजस्थान: पंचायत चुनाव टल सकते हैं चुनाव, हाईकोर्ट में सुनवाई

बलजीत सिंह शेखावत

राजस्थान सरकार और चुनाव आयोग ने पंचायत चुनाव टालने के लिए हाईकोर्ट में लगाई अर्जी, 11 मई को सुनवाई।

HIGHLIGHTS

  • राजस्थान हाईकोर्ट 11 मई को चुनाव टालने की याचिका पर सुनवाई करेगा।
  • राज्य सरकार ने दिसंबर तक का समय मांगा है और ओबीसी आरक्षण का हवाला दिया।
  • निर्वाचन आयोग ने भी सरकार के तर्कों का समर्थन करते हुए हाथ खड़े किए हैं।
  • पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की अवमानना याचिका पर 18 मई को कोर्ट सुनवाई करेगा।
rajasthan panchayat election postponement high court hearing update

जयपुर | राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों के आयोजन को लेकर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग ने इन चुनावों को फिलहाल टालने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट में विशेष प्रार्थना पत्र पेश किया है।

इस गंभीर मामले पर हाईकोर्ट आगामी 11 मई को सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। सरकार ने वर्तमान परिस्थितियों का हवाला देते हुए दिसंबर तक का समय मांगा है ताकि सभी व्यवस्थाएं सुचारू की जा सकें।

चुनाव टालने के पीछे सरकार के मुख्य तर्क

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान में चुनाव कराना संभव नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि कई पंचायत समितियों और जिला परिषदों का कार्यकाल अक्टूबर से दिसंबर के बीच समाप्त हो रहा है।

सरकार का मानना है कि सभी निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद एक साथ चुनाव कराना अधिक तर्कसंगत होगा। इससे प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव कम होगा और चुनावी खर्च के साथ-साथ समय की भी बड़ी बचत होगी।

महाधिवक्ता ने 'वन स्टेट वन इलेक्शन' की धारणा पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस कदम से राज्य में चुनावी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने में मदद मिलेगी और विकास कार्यों में कोई बाधा नहीं आएगी।

संसाधनों की कमी और ओबीसी आरक्षण का मुद्दा

प्रार्थना पत्र में सरकार ने ओबीसी आयोग की रिपोर्ट का विशेष उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार, ओबीसी सीटों के निर्धारण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, जिसके बिना निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संभव नहीं हैं।

इसके अलावा, स्कूलों की बोर्ड परीक्षाओं, शैक्षणिक स्टाफ की ड्यूटी और ईवीएम मशीनों की उपलब्धता जैसे प्रशासनिक कारणों को भी आधार बनाया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि 15 अप्रैल तक चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं था।

"वर्तमान परिस्थितियों और संसाधनों की उपलब्धता को देखते हुए दिसंबर तक का समय दिया जाना आवश्यक है ताकि चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो सके।"

सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह चुनाव कराने के पक्ष में है, लेकिन जमीनी हकीकत और संसाधनों की कमी के कारण उसे मोहलत चाहिए। इसके लिए हर महीने की स्थिति का विवरण भी पेश किया गया है।

राज्य निर्वाचन आयोग ने भी खड़े किए हाथ

दिलचस्प बात यह है कि राज्य निर्वाचन आयोग ने भी सरकार के सुर में सुर मिलाया है। आयोग ने हाईकोर्ट में अलग से प्रार्थना पत्र दायर कर चुनाव स्थगित करने की सरकारी मांग का पूर्ण समर्थन किया है।

आयोग ने अपने प्रार्थना पत्र में स्वीकार किया कि ओबीसी आरक्षण के नए प्रावधानों के तहत सीटों का पुनर्गठन किए बिना चुनाव प्रक्रिया शुरू करना कानूनी पेचीदगियां पैदा कर सकता है। इससे भविष्य में कानूनी विवाद बढ़ सकते हैं।

आयोग ने स्पष्ट किया कि वह चुनाव कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन तकनीकी और कानूनी अड़चनों के कारण उसे अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। इससे पहले कोर्ट ने 15 अप्रैल तक चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।

अवमानना याचिका और आगामी कानूनी चुनौतियां

चुनावों में देरी को लेकर हाईकोर्ट में पहले ही एक अवमानना याचिका दायर की जा चुकी है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिरिराज सिंह देवंदा ने यह याचिका दायर कर कोर्ट के आदेश की अवहेलना का आरोप लगाया है।

इस अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट 18 मई को सुनवाई करेगा। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार और चुनाव आयोग जानबूझकर लोकतंत्र के निचले स्तर के चुनावों में देरी कर रहे हैं, जो कि पूरी तरह असंवैधानिक कृत्य है।

अब सबकी नजरें 11 मई की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि कोर्ट सरकार की दलीलों से संतुष्ट होता है, तो चुनाव साल के अंत तक खिंच सकते हैं। अन्यथा, सरकार को जल्द चुनाव कराने का सख्त निर्देश मिल सकता है।

निष्कर्ष के तौर पर, राजस्थान में स्थानीय स्वशासन की दिशा में यह कानूनी लड़ाई बेहद निर्णायक मोड़ पर है। कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि प्रदेश में जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया कब और किस स्वरूप में आगे बढ़ेगी।

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