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राजनीति

चुनाव टालने पर भड़के संयम लोढ़ा: संयम लोढ़ा का बड़ा हमला: चुनाव टालना ओबीसी से अन्याय

Pradeep Beedawat

राजस्थान में निकाय चुनाव टालने पर पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने सरकार को घेरा।

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HIGHLIGHTS

  • संयम लोढ़ा ने राजस्थान सरकार पर ओबीसी आरक्षण के नाम पर चुनाव टालने का आरोप लगाया।
  • हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2026 तक स्थानीय निकाय चुनाव कराने की सख्त समय-सीमा दी है।
  • अधिकारियों को समय पर चुनाव न कराने पर अदालत की अवमानना का नोटिस भेजा गया है।
  • लोढ़ा ने इसे पिछड़े वर्गों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर बड़ा कुठाराघात करार दिया है।
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जयपुर | राजस्थान में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों को लेकर सियासी सरगर्मी अब पूरी तरह से तेज हो गई है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने इस मुद्दे पर सरकार पर तीखा हमला बोला है।

उन्होंने चुनाव टालने की कोशिशों को ओबीसी वर्ग के साथ बड़ा अन्याय बताया है। संयम लोढ़ा के इस बयान ने राज्य की राजनीति में नया उबाल ला दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट की 31 जुलाई 2026 की डेडलाइन जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे सरकार और विपक्ष के बीच जुबानी जंग भी तेज होती जा रही है।

हाईकोर्ट का सख्त आदेश और प्रशासनिक सुस्ती

संयम लोढ़ा ने कहा कि माननीय राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 22 मई 2026 को ही इस मामले में अपना रुख साफ कर दिया था। कोर्ट ने चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।

न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि 31 जुलाई तक हर हाल में चुनाव प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए। इसके बावजूद प्रशासनिक अधिकारी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं।

स्वायत्त शासन विभाग और पंचायती राज विभाग केवल कागजी पत्राचार में उलझे हुए हैं। धरातल पर चुनाव की तैयारियां अभी तक शुरू भी नहीं हो पाई हैं।

ओबीसी आरक्षण के नाम पर गुमराह करने का आरोप

संयम लोढ़ा ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह ओबीसी आरक्षण और ट्रिपल टेस्ट की आड़ में जानबूझकर चुनाव टालने की कोशिश कर रही है। यह बेहद निंदनीय है।

"न्यायालय ने साफ कहा था कि ट्रिपल टेस्ट या ओबीसी आयोग की सुस्ती को आधार बनाकर जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता है।"

लोढ़ा ने कहा कि यह पिछड़े वर्गों को उनका संवैधानिक हक न देने की सोची-समझी रणनीति है। अधिकारी स्थानीय निकायों पर नौकरशाही का कब्जा बनाए रखना चाहते हैं।

वार्ड डिलिमिटेशन और वोटर लिस्ट बनाने का काम भी समय पर पूरा नहीं हुआ। जून का पूरा महीना अधिकारियों ने मीटिंग और लेटर में बर्बाद कर दिया।

डी.बी. सिविल रिट के मामले में हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है।

20 जून 2026 तक सभी वार्डों का परिसीमन पूरा हो जाना चाहिए था। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह काम समय पर पूरा नहीं हो सका।

अधिकारियों पर लटकी अवमानना की तलवार

इस प्रशासनिक ढिलाई के खिलाफ अब शीर्ष अधिकारियों को 'न्याय की मांग' का लीगल नोटिस भी भेजा जा चुका है। इससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

संयम लोढ़ा ने इस कानूनी कदम का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि समय पर चुनाव अधिसूचना जारी नहीं हुई तो गंभीर परिणाम होंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं रह गया है। यह राजस्थान में एक बड़ा ओबीसी राजनीतिक नैरेटिव बनता जा रहा है।

यदि 31 जुलाई तक चुनाव नहीं होते हैं, तो विपक्ष इस मामले को दोबारा अदालत में ले जाएगा। इससे सरकार की चौतरफा किरकिरी होना पूरी तरह तय है।

पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई सामाजिक संगठन भी अब लामबंद होने लगे हैं। राज्य में एक बड़ा आंदोलन भी शुरू हो सकता है।

विपक्ष का आरोप है कि सरकार चुनाव हारने के डर से इन्हें टालने का प्रयास कर रही है। ग्रामीण इलाकों में सरकार के खिलाफ माहौल बन रहा है।

इस विवाद ने पंचायती राज व्यवस्था की स्वायत्तता पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। नौकरशाही का बढ़ता हस्तक्षेप लोकतंत्र के लिए घातक संकेत है।

क्या समय पर हो पाएंगे निकाय चुनाव?

स्थानीय स्वशासन ही हमारे लोकतंत्र की असली और मजबूत बुनियाद है। संयम लोढ़ा के इन तीखे सवालों के बाद अब गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है।

क्या सरकार हाईकोर्ट की 31 जुलाई की समय-सीमा का सम्मान करेगी? या फिर यह मामला एक बड़े कानूनी और राजनीतिक टकराव का रूप ले लेगा, यह देखना होगा।

जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए पूरी तरह तैयार है। सरकार को जल्द से जल्द इस दिशा में सकारात्मक और ठोस निर्णय लेना ही होगा।

संयम लोढ़ा के इस आक्रामक रुख ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में राजस्थान की सियासत में चुनाव को लेकर घमासान और तेज होगा।

*Edit with Google AI Studio

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