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भारत

श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद: श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद: SC में सुनवाई टली, अगली तारीख 12 अगस्त

बलजीत सिंह शेखावत

मथुरा के बहुचर्चित श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित सुनवाई टल गई है। अब इस मामले पर 12 अगस्त को सुनवाई होगी।

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HIGHLIGHTS

  • सुप्रीम कोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद की सुनवाई टली।
  • मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 अगस्त की तारीख तय की गई।
  • हिंदू पक्ष जन्मभूमि पर स्वामित्व और पूजा के अधिकार की मांग कर रहा है।
  • मुस्लिम पक्ष 1968 के समझौते का हवाला देकर विवाद खत्म होने का दावा करता है।
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मथुरा |

मथुरा के बहुचर्चित श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित सुनवाई नहीं हो सकी। शीर्ष अदालत ने अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 अगस्त की तारीख तय की है।

प्रतिनिधिक वाद पर भी होनी थी सुनवाई

मुख्य विवाद के साथ-साथ, शीर्ष अदालत को इस मुद्दे पर भी सुनवाई करनी थी कि हिंदू पक्ष द्वारा दायर विभिन्न याचिकाओं में से किसे प्रतिनिधिक (Representative Suit) वाद माना जाए।

इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाद संख्या-17 को प्रतिनिधिक वाद के रूप में स्वीकार किया था। हालांकि, अन्य हिंदू याचिकाकर्ताओं ने इस पर आपत्ति जताई है।

उनका कहना है कि उनकी याचिकाएं अलग-अलग तथ्यों, दावों और कानूनी आधारों पर आधारित हैं। इसलिए, केवल एक वाद को प्रतिनिधिक मानकर बाकी मामलों का निस्तारण नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर और उससे सटी शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़ा हुआ है। हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर स्थित है।

हिंदू पक्ष के दावे

हिंदू पक्ष का कहना है कि 17वीं सदी में मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में प्राचीन केशवदेव मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद का निर्माण कराया गया था।

वे अदालत से जन्मभूमि स्थल पर स्वामित्व, पूजा-अर्चना के अधिकार और परिसर की वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक जांच की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर पूरे विवादित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

मुस्लिम पक्ष का तर्क

वहीं, मुस्लिम पक्ष शाही ईदगाह मस्जिद की ऐतिहासिक और कानूनी वैधता का दावा करता है। मस्जिद प्रबंधन का कहना है कि वर्ष 1968 में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के बाद यह विवाद समाप्त हो चुका है। उनका तर्क है कि दशकों पुराने समझौते को चुनौती देने का कोई औचित्य नहीं है।

संयम बरतने की अपील

इससे पहले 5 जुलाई को शाही ईदगाह कमेटी के सचिव और अधिवक्ता तनवीर अहमद ने मामले को लेकर संयम बरतने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि किसी भी पक्ष को भड़काऊ बयानबाजी से बचना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखना चाहिए।

तनवीर अहमद ने कहा था कि मंदिर और मस्जिद दोनों के प्रवेश मार्ग अलग-अलग हैं और दोनों स्थानों पर धार्मिक गतिविधियां नियमित रूप से संचालित होती हैं। उनके मुताबिक, यह परिसर लंबे समय से सामाजिक सौहार्द और सहअस्तित्व का उदाहरण रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब मामला अदालत में विचाराधीन है, तब सभी पक्षों को न्यायालय के फैसले का इंतजार करना चाहिए।

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