अरावली में अवैध खनन का तांडव: अरावली के 1 किलोमीटर लंबे पहाड़ में अब सिर्फ गड्ढे: भिवाड़ी में खनन माफिया ने पहाड़ियों को किया छलनी

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Highlights

  • अरावली के कहरानी गांव में अवैध खनन से 1 किलोमीटर लंबा पहाड़ पूरी तरह गायब हो गया है।
  • माफियाओं ने करीब 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खनिज अवैध रूप से बेच दिया है।
  • अवैध खनन के दौरान हुए हादसों और पानी में डूबने से अब तक 15 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।
  • सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा के अनुसार 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों पर संकट बढ़ गया है।

अलवर | दिल्ली और एनसीआर के बेहद नजदीक स्थित भिवाड़ी के कहरानी गांव में अरावली की पहाड़ियों की जो तस्वीर सामने आई है वह पर्यावरण संरक्षण के दावों की पोल खोलती है। राजस्थान सहित पूरे देश में अरावली बचाओ अभियान चलाया जा रहा है लेकिन तिजारा और खैरथल के सीमावर्ती इलाकों से झकझोर देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं। कहरानी की पहाड़ियों में पिछले कुछ वर्षों में इतना अधिक अवैध खनन हुआ है कि अब वहां केवल टावरनुमा नुकीली चट्टानें ही बची हैं। जो पहाड़ कभी विशाल और हरे-भरे दिखाई देते थे वे अब पूरी तरह खत्म हो चुके हैं और उनकी जगह 50-50 फीट गहरे खतरनाक गड्ढे बन गए हैं।

अरावली की नई परिभाषा और गहराता संकट

हाल ही में जब से सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी दी है तब से पर्यावरण प्रेमियों के बीच भारी चिंता देखी जा रही है। इस नई परिभाषा के अनुसार केवल 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ी को ही अरावली का हिस्सा माना जाएगा। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार अरावली की करीब 12 हजार पहाड़ियों में से केवल 8 प्रतिशत ही ऐसी हैं जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से अधिक है। इसका सीधा मतलब यह है कि बाकी बची पहाड़ियों पर खनन माफिया की नजरें और भी टेढ़ी हो सकती हैं। कहरानी में ड्रोन से किए गए सर्वे में सामने आया कि पहाड़ियों की ऊंचाई अब मात्र 70 से 80 मीटर ही रह गई है क्योंकि जमीन के स्तर से नीचे तक पत्थर निकाल लिए गए हैं।

एक लाख करोड़ की खनिज संपदा की लूट

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का दावा है कि इस पूरे इलाके में माफियाओं ने एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की खनिज संपदा को अवैध रूप से बेच डाला है। साल 2014 में अलवर के वन विभाग के अधिकारियों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश पर एक सर्वे किया था जिसमें 50 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का आकलन किया गया था। पिछले दस वर्षों में यह आंकड़ा दोगुना हो चुका है। कहरानी के अकेले एक पहाड़ पर अवैध खनन का क्षेत्रफल ढाई वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसके आसपास के करीब 300 गांवों में भी इसी तरह का अवैध कारोबार सालों तक बेधड़क चलता रहा है।

भ्रष्टाचार और पुलिस की मिलीभगत

स्थानीय बुजुर्गों और ग्रामीणों का कहना है कि यह सब पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे होता रहा है। जोड़िया गांव के किसान सराजुद्दीन बताते हैं कि वसुंधरा और गहलोत दोनों ही सरकारों के कार्यकाल में जमकर अवैध खनन हुआ। उस समय पुलिस एक डंपर के बदले 3 हजार रुपये प्रति महीना वसूलती थी। रात-दिन में करीब 1000 डंपर यहां से गुजरते थे जो हरियाणा, दिल्ली और नोएडा तक पत्थर ले जाते थे। प्रशासन ने इस लूट को रोकने के बजाय इसमें अपनी हिस्सेदारी तय कर ली थी जिससे माफियाओं के हौसले बुलंद होते गए और देखते ही देखते पूरे पहाड़ गायब हो गए।

मौत का कुआं बनीं अवैध खदानें

अवैध खनन ने न केवल प्रकृति को नुकसान पहुंचाया बल्कि कई परिवारों को भी उजाड़ दिया। स्थानीय चरवाहे हकमू के अनुसार खनन के दौरान हुए हादसों में अब तक 15 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। पहाड़ियों को गहराई तक खोदने के कारण वहां बड़े-बड़े तालाब बन गए हैं जिनमें बारिश का पानी भरने से अब तक चार-पांच लोग डूबकर मर चुके हैं। हालांकि अब खनन बंद होने से शोर-शराबा कम हुआ है और दुर्घटनाओं में भी कमी आई है लेकिन जो नुकसान होना था वह पहले ही हो चुका है। अब गांव के लोग वापस अपनी पुरानी खेती-बाड़ी की ओर लौटने की कोशिश कर रहे हैं।

बेरोजगारी और भविष्य की चिंता

एक तरफ जहां अवैध खनन से पर्यावरण का विनाश हुआ वहीं दूसरी तरफ इसके बंद होने से स्थानीय युवाओं के सामने रोजगार का संकट भी खड़ा हो गया है। चौपनकी के रहने वाले साहिल बताते हैं कि खनन बंद होने के बाद बेरोजगारी चरम पर है। आसपास की फैक्ट्रियों में स्थानीय लोगों को काम नहीं दिया जाता है जिससे गरीब परिवारों का गुजारा मुश्किल हो गया है। ग्रामीण अब मांग कर रहे हैं कि सरकार को वैध तरीके से लीज जारी करनी चाहिए ताकि पर्यावरण नियमों का पालन भी हो सके और लोगों को काम भी मिल सके।

प्रशासनिक कार्रवाई और माफिया का दबाव

साल 2012 में जब तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक टी गुइटे और आईएफएस अधिकारी पी काथिरवेल ने अवैध खनन के खिलाफ सख्त रुख अपनाया था तब माफियाओं में हड़कंप मच गया था। उस समय 200 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए थे और खनन पर काफी हद तक लगाम लग गई थी। लेकिन माफियाओं के राजनीतिक रसूख के कारण इन ईमानदार अफसरों का तबादला कर दिया गया। इसके बाद फिर से वही पुरानी स्थिति बहाल हो गई। आज भी अलवर और आसपास के इलाकों में चोरी-छिपे खनन जारी है जिसे पूरी तरह रोकने में प्रशासन विफल साबित हो रहा है।

अरावली का महत्व और संरक्षण की जरूरत

अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली से लेकर गुजरात तक 670 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। यह श्रृंखला थार मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकने के साथ-साथ एनसीआर क्षेत्र के लिए फेफड़ों का काम करती है। यदि इसी तरह पहाड़ियों को खत्म किया जाता रहा तो आने वाले समय में जल संकट और प्रदूषण की समस्या और भी विकराल हो जाएगी। कहरानी की ये तस्वीरें एक चेतावनी हैं कि अगर हम अब भी नहीं संभले तो आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल धूल और गहरे गड्ढे ही बचेंगे। सरकार को चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई से पालन कराए और अरावली के बचे हुए हिस्सों को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए।

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