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भारतीयता की रक्षा सबसे बड़ी चुनौती: भारतीयता की रक्षा सबसे बड़ी चुनौती: शंकराचार्य

गणपत सिंह मांडोली

रेवदर में जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीयता की रक्षा है। उन्होंने गोसेवा, गुरु-शरण और धर्ममय नेतृत्व का संदेश दिया।

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HIGHLIGHTS

  • जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि भारत में भारतीयता की रक्षा सबसे बड़ी चुनौती है।
  • उन्होंने महाराज दिलीप का उदाहरण देकर गोसेवा को त्याग और कर्तव्य का प्रतीक बताया।
  • शंकराचार्य ने कहा कि नेतृत्व को शासन से पहले आचरण का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।
  • गुरु-दीक्षा से ही मंत्र में वास्तविक शक्ति जागृत होती है और मनुष्यता प्रकट होती है।
jagadguru shankaracharya says protecting indianness is biggest challenge in revdar

रेवदर |अर्बुदारण्य की पावन धरा पर स्थित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में आयोजित श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव में द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती जी महाराज ने धर्म, गोसेवा, गुरु-शरण और भारतीय संस्कृति पर एक भावपूर्ण प्रवचन दिया।

भारत में भारतीयता की रक्षा सबसे बड़ी चुनौती

प्रवचन के दौरान जगद्गुरु शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से कहा कि आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'भारतीयता' की रक्षा करना है।

उन्होंने समझाया कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं है, बल्कि यह धर्म, गुरु-परम्परा, गौ-संरक्षण, संस्कार, परिवार व्यवस्था, त्याग, तप, वेद-शास्त्र और करुणा से निर्मित एक जीवंत जीवन-दृष्टि का नाम है।

जगद्गुरु ने इस बात पर जोर दिया कि गाय की रक्षा केवल एक पशु की रक्षा नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के करुणामय और धर्ममय चरित्र की रक्षा का प्रतीक है।

महाराज दिलीप की गोभक्ति का प्रसंग

जगद्गुरु ने महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध ग्रंथ 'रघुवंश' में वर्णित महाराज दिलीप की गोभक्ति का प्रसंग सुनाया।

उन्होंने कहा कि गोसेवा केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह त्याग, कर्तव्य और संरक्षण की भारतीय जीवन-दृष्टि को दर्शाता है।

महाराज दिलीप ने गोमाता की रक्षा के लिए अपने प्राण तक अर्पित करने की तैयारी कर ली थी। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भारतीय संस्कृति में अधिकार से पहले कर्तव्य और स्वयं से पहले संरक्षण का भाव सर्वोपरि रहा है।

'यथा राजा तथा प्रजा' — नेतृत्व पहले आचरण से

जगद्गुरु ने 'यथा राजा तथा प्रजा' के प्राचीन सिद्धांत को समझाते हुए कहा कि नेतृत्व केवल शासन करने का अधिकार नहीं है, बल्कि यह समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करने का महान उत्तरदायित्व है।

उन्होंने बताया कि राजा दिलीप ने गौ रक्षा का संदेश केवल दिया नहीं, बल्कि स्वयं अपने आचरण से उसका एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा, “भारतीय नेतृत्व की विशेषता यही रही है—पहले स्वयं आचरण करो, फिर समाज से अपेक्षा रखो।”

गुरु-दीक्षा से मंत्र में जागती है शक्ति

मंत्र-दीक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए जगद्गुरु ने कहा कि केवल मंत्र के अक्षरों को जान लेना ही पर्याप्त नहीं होता है।

उन्होंने समझाया कि जब गुरु से दीक्षा, श्रद्धा, नियम और साधना का संयोग होता है, तभी मंत्र साधक के जीवन में वास्तविक शक्ति का संचार करता है।

जिस प्रकार एक छोटे से बीज में एक विशाल वृक्ष की संभावना छिपी होती है, उसी प्रकार मंत्र में अपार आध्यात्मिक शक्ति निहित रहती है। गुरु-दीक्षा उस बीज को साधक के हृदय रूपी भूमि में स्थापित करती है।

गुरु-शरण से मनुष्यता का जागरण

जगद्गुरु ने कहा कि केवल मनुष्य का शरीर प्राप्त कर लेना ही पूर्ण मनुष्यता नहीं है।

जब व्यक्ति के भीतर विवेक, करुणा, संयम, सेवा, धर्म और ईश्वरबोध जागृत होता है, तभी वास्तविक मनुष्यता प्रकट होती है। इसके लिए गुरु की शरण में जाना अत्यंत आवश्यक है।

यह लोक मायका, परलोक ससुराल

एक सहज उदाहरण देते हुए उन्होंने जीवन का सार समझाया। उन्होंने कहा, “यह संसार हमारा मायका है, जबकि जीव की अंतिम यात्रा परलोक की ओर है, जो हमारी ससुराल है।”

इसलिए मनुष्य को इस लोक में रहते हुए ऐसे सत्कर्म, धर्म, सेवा, गोसेवा और साधना करनी चाहिए, जिससे उसकी परलोक-यात्रा भी मंगलमय और सुखद हो।

प्रवचन का समग्र संदेश यही रहा कि गोमाता के प्रति सेवा और त्याग का भाव जागृत हो, नेतृत्व में धर्म और चरित्र का समावेश हो, और गुरु की शरण में मनुष्य के भीतर वास्तविक मनुष्यता का उदय हो।

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