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राजस्थान

भीलवाड़ा: 1KM नदी पार कर मोटर चलाते हैं नंदाराम, 3 गांवों को मिलता है पानी

गणपत सिंह मांडोली गणपत सिंह मांडोली 32

भीलवाड़ा (Bhilwara) के मांडल (Mandal) तहसील के पीथास (Pithas) गांव में 50 वर्षीय नंदाराम (Nandaram) रोज 1 किलोमीटर कोठारी नदी (Kothari River) पार कर पानी की मोटर चालू करते हैं। यह मोटर पीथास, मालाखेड़ा (Malakheda) और स्कूल का खेड़ा (School ka Kheda) समेत तीन गांवों की करीब 5 हजार आबादी की प्यास बुझाती है।

HIGHLIGHTS

  1. 1 50 वर्षीय नंदाराम रोज 1 किलोमीटर लंबी नदी पार कर पानी की मोटर चालू करते हैं। यह मोटर भीलवाड़ा के तीन गांवों की करीब 5 हजार आबादी को पानी सप्लाई करती है। कड़ाके की ठंड में भी नंदाराम कमर भर पानी में उतरकर अपनी जान जोखिम में डालते हैं। जलदाय विभाग के नलकर्मी नंदाराम को इस काम के लिए मात्र 400 रुपये मासिक मिलते हैं।
bhilwara 1km river par kar motor chalate hain nandaram 3 gaon ko milta hai pani
गांवों की प्यास बुझाने रोज जान जोखिम में

भीलवाड़ा: भीलवाड़ा (Bhilwara) के मांडल (Mandal) तहसील के पीथास (Pithas) गांव में 50 वर्षीय नंदाराम (Nandaram) रोज 1 किलोमीटर कोठारी नदी (Kothari River) पार कर पानी की मोटर चालू करते हैं। यह मोटर पीथास, मालाखेड़ा (Malakheda) और स्कूल का खेड़ा (School ka Kheda) समेत तीन गांवों की करीब 5 हजार आबादी की प्यास बुझाती है।

यह कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जो अपनी जान जोखिम में डालकर हजारों लोगों को पानी उपलब्ध कराता है। नंदाराम का यह संघर्ष जाड़ा, गर्मी, बरसात, हर मौसम में जारी रहता है, जो उनकी अटूट कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।

रोजाना का संघर्ष: 1 किलोमीटर पानी में चलकर मोटर चालू करना

50 वर्षीय नंदाराम का यह रोज का काम है, जो पिछले कई सालों से चला आ रहा है। उन्हें प्रतिदिन कमर भर पानी में उतरकर एक किलोमीटर लंबी कोठारी नदी पार करनी पड़ती है।

यदि नंदाराम एक दिन भी यह जोखिम भरा काम न करें, तो पीथास, मालाखेड़ा और स्कूल का खेड़ा जैसे तीन गांवों के लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस जाएंगे। यह उनकी कर्तव्यनिष्ठा का ही परिणाम है कि ग्रामीण प्यासे नहीं रहते और उन्हें नियमित रूप से पीने का पानी मिलता है।

पानी की मोटर तक पहुंचने का जोखिम भरा रास्ता

नंदाराम रोजाना कोठारी नदी के बीच से होकर पानी की मोटर वाले कमरे तक पहुंचते हैं, जो नदी के पानी से घिरा रहता है। यह मोटर मेजा बांध के पेटा क्षेत्र में बने जलदाय विभाग के वाटर वर्क्स में स्थापित है।

मोटर चालू करने के बाद उन्हें करीब दो घंटे तक वहीं रुकना पड़ता है, जब तक कि पानी की टंकियां भर न जाएं। इस दौरान वे पानी के बीच ही खड़े रहते हैं, जो अपने आप में एक बड़ी चुनौती और धैर्य का काम है।

कड़ाके की ठंड और जहरीले जीवों का खतरा

सर्दियों के मौसम में जब भीलवाड़ा का पारा 5 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, तब भी नंदाराम सुबह-सुबह कमर भर पानी के बीच से करीब एक किलोमीटर का रास्ता तय करते हैं। पिछले दो महीने से वे रोजाना सुबह 6 बजे तीन फीट गहरे पानी में उतरते हैं, जब ठंड अपने चरम पर होती है।

नंदाराम बताते हैं कि यह समस्या हर साल आती है, लेकिन गांवों की प्यास बुझाने के लिए उन्हें यह जोखिम उठाना ही पड़ता है। बिना किसी सुरक्षा उपकरण के पानी में उतरना उनकी मजबूरी है, जो उनकी सुरक्षा के प्रति चिंता पैदा करता है।

सांप और अन्य जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा

पानी में जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा भी हमेशा बना रहता है। कई बार उन्हें पानी में तैरते हुए सांप मिलते हैं, जिससे उनकी जान को हर पल खतरा रहता है।

इसके बावजूद, उनके मन में यही ख्याल आता है कि यदि मोटर चालू नहीं हुई तो हजारों लोगों को पीने का पानी कैसे मिलेगा। यह सोच उन्हें अपने डर पर काबू पाने और अपनी जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देती है।

लाइनमैन का काम भी खुद ही संभालते हैं

सिर्फ मोटर चालू करना ही नहीं, बल्कि कभी-कभी बिजली के फ्यूज में खराबी आने पर उसे ठीक करने का काम भी नंदाराम ही करते हैं। 19 दिसंबर को भी ऐसी ही समस्या आने पर उन्हें दोबारा पानी में उतरकर फॉल्ट सही करना पड़ा था।

कुएं पर लगे बिजली के उपकरण भी पानी में ही होते हैं, जिससे यह काम और भी खतरनाक हो जाता है। वे नलकर्मी होने के साथ-साथ एक कुशल लाइनमैन की भूमिका भी निभाते हैं, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।

तीन गांवों की 5 हजार आबादी की प्यास बुझाने वाला वाटर वर्क्स

जलदाय विभाग का यह वाटर वर्क्स मेजा बांध के पेटा क्षेत्र में स्थित है। यहां लगी मोटर के माध्यम से पीथास, मालाखेड़ा और स्कूल का खेड़ा, कुल तीन गांवों में पानी की सप्लाई होती है।

पीथास गांव की आबादी करीब तीन हजार है, जबकि मालाखेड़ा की 800 और स्कूल खेड़ा की आबादी 1 हजार है। इस प्रकार, कुल 5 हजार की आबादी की पेयजल सुविधा का महत्वपूर्ण सवाल नंदाराम के अथक प्रयासों पर निर्भर करता है।

रोजाना 9 घंटे का अथक परिश्रम और जल वितरण

जलदाय विभाग ने नंदाराम को नलकर्मी के पद पर संविदा पर नियुक्त किया हुआ है। उन्हें रोजाना वाटर वर्क्स की टंकियों को भरने में लगभग 9 घंटे लग जाते हैं, जिसमें नदी पार करना और मोटर चलाना शामिल है।

टंकियां भरने के बाद, गांव में करीब 4 घंटे तक पेयजल सप्लाई की जाती है। यह उनका अथक परिश्रम ही है जो इन गांवों में पानी की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करता है, जिससे ग्रामीणों को राहत मिलती है।

मात्र 400 रुपये मासिक पर जान जोखिम में

यह जानकर हैरानी होती है कि इस जोखिम भरे और अत्यंत महत्वपूर्ण काम के लिए नंदाराम को महीने के मात्र 400 रुपये मिलते हैं। यह राशि उनके अथक प्रयास, समर्पण और जान जोखिम में डालने के मुकाबले बहुत कम है।

कम वेतन के बावजूद, नंदाराम का समर्पण और सेवाभाव प्रशंसनीय है। वे बिना किसी शिकायत के अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, ताकि गांवों की प्यास बुझ सके और कोई भी पानी के अभाव में परेशान न हो।

नंदाराम जैसे गुमनाम नायकों का संघर्ष अक्सर अनदेखा रह जाता है, जबकि वे समाज के लिए अमूल्य योगदान देते हैं। उनकी कहानी हमें ग्रामीण भारत में जल आपूर्ति के लिए किए जा रहे अथक प्रयासों और गंभीर चुनौतियों से रूबरू कराती है।

यह स्थानीय प्रशासन और जलदाय विभाग के लिए भी एक विचारणीय विषय है कि ऐसे समर्पित कर्मचारियों के लिए बेहतर सुविधाएं, उचित मानदेय और सुरक्षा उपकरण सुनिश्चित किए जाएं। उनकी सुरक्षा और सम्मान हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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