रेवदर |श्रीराम सहित चारों भाइयों के विवाह के बाद जनकपुरी में विदाई का भावुक प्रसंग सामने आया। श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ में इस प्रसंग पर प्रकाश डाला गया। द्वारका शारदा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज ने रामकथा के माध्यम से जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक एवं सामाजिक संदेशों को समझाया। यह आयोजन गो ऋषि दत्त शरणानंद जी महाराज के सानिध्य में हुआ।
जनकपुरी की विदाई का संदेश: रामकथा: जनकपुरी की विदाई में छिपा जीवन का गहरा संदेश
रेवदर में रामकथा के दौरान शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने जनकपुरी की विदाई का प्रसंग सुनाते हुए संस्कारों और सद्गुरु के महत्व पर प्रकाश डाला।
HIGHLIGHTS
- रामकथा में जनकपुरी की विदाई के माध्यम से जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक एवं सामाजिक संदेशों पर प्रकाश डाला गया।
- स्वामी सदानंद सरस्वती जी ने कहा कि संपत्ति समाप्त हो सकती है, लेकिन संस्कार जीवनभर मार्गदर्शन करते हैं।
- कथा में कर्मफल का महत्व समझाते हुए कहा गया कि इसका बोध व्यक्ति को भीतर से बदलता है।
- सद्गुरु की भूमिका को जीवन रूपी रथ के कुशल सारथी के समान बताया गया, जो मंजिल तक पहुंचाता है।
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संस्कार ही सबसे बड़ा धन
स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि महाराज जनक ने अपनी पुत्रियों को धन, वस्त्र, आभूषण एवं आवश्यक सामग्री देकर विदा किया।
उन्होंने जोर देकर कहा कि संतान के लिए सबसे बड़ा धन संस्कार होते हैं।
महाराजश्री ने समझाया, "संपत्ति समाप्त हो सकती है, लेकिन संस्कार जीवनभर मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं।"
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इसलिए, राम-विवाह केवल एक वैवाहिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह मर्यादा, कर्तव्य, सम्मान और संस्कार का एक महान संदेश है।
पंचमहायज्ञों का महत्व
कथा के दौरान पंचमहायज्ञों के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया।
इन यज्ञों के माध्यम से स्वाध्याय, देवताओं के प्रति कृतज्ञता, पितरों का स्मरण, सभी प्राणियों के प्रति करुणा और समाज सेवा का संदेश दिया गया।
इसके साथ ही मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को संयमित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।
कर्मफल का बोध जरूरी
कर्मफल का महत्व समझाने के लिए स्वामी जी ने एक पंडित और राजा की कथा सुनाई।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य को अपने हर कर्म का परिणाम उसी क्षण दिखाई देने लगे, तो वह पाप करने से पहले ही रुक जाएगा।
उनके अनुसार, कानून का भय व्यक्ति को कुछ समय के लिए रोक सकता है, लेकिन कर्मफल का सच्चा बोध व्यक्ति को भीतर से बदल देता है।
उन्होंने गोचरभूमि को समाज की सामूहिक संपदा बताते हुए इसके संरक्षण को एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सामाजिक जिम्मेदारी बताया।
सद्गुरु दिखाते हैं सही मार्ग
स्वामी सदानंद सरस्वती जी ने 'नेति-नेति' सिद्धांत के माध्यम से आत्मबोध और परमात्मतत्त्व की भी चर्चा की।
उन्होंने सद्गुरु की भूमिका को जीवन रूपी रथ के एक कुशल सारथी के समान बताया, जो हमें सही मंजिल तक पहुंचाता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन रूपी रथ को उसकी मंजिल तक पहुंचाने के लिए सद्गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।
श्रीराम के जीवन को मर्यादा, आज्ञापालन और कर्तव्य का आदर्श बताते हुए उन्होंने कहा कि जनकपुरी से अयोध्या की विदाई केवल एक पारिवारिक घटना नहीं, बल्कि नई जिम्मेदारियों की ओर प्रस्थान का प्रतीक है।
इस अवसर पर ऋषिचैतन्य जी महाराज, चेतननाथ जी महाराज, मोहन बाबा, और हजारों गोभक्त उपस्थित रहे, जिनमें भूरजी अदरींग जी राजपुरोहित सांथू, विशनसिंह सांथू, दिनेश कुमार सांथू, और अन्य प्रमुख व्यक्ति शामिल थे।
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