नई दिल्ली | पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों और मिडिल ईस्ट में जारी ऊर्जा संकट के बावजूद भारत और रूस के बीच तेल का व्यापार रुकने का नाम नहीं ले रहा है। हैरानी की बात यह है कि तमाम पाबंदियों के बाद भी रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। आखिर यह सब कैसे मुमकिन हो पा रहा है? हालिया रिपोर्ट्स में दो ऐसे समुद्री रास्तों और एक 'सीक्रेट' तरीके का खुलासा हुआ है, जिसकी मदद से रूसी तेल भारतीय बंदरगाहों तक सुरक्षित पहुंच रहा है।
रूसी तेल भारत कैसे आता है?: प्रतिबंधों को ठेंगा दिखाकर भारत पहुंच रहा रूसी तेल, सामने आया समुद्र में तेल ट्रांसफर का 'सीक्रेट' तरीका
पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है। जानें वे कौन से दो समुद्री रास्ते और गुप्त तरीके हैं जिनका इस्तेमाल इस तेल को भारत लाने के लिए किया जा रहा है।
HIGHLIGHTS
- रूस से भारत तेल लाने के लिए बाल्टिक और काला सागर के दो प्रमुख रास्तों का इस्तेमाल होता है।
- प्रतिबंधों से बचने के लिए 'शिप-टू-शिप' ट्रांसफर का सीक्रेट तरीका अपनाया जा रहा है।
- भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले रूस से आयात कर रहा है।
- बाल्टिक सागर मार्ग से भारत पहुंचने में तेल टैंकरों को करीब 25 से 30 दिन का समय लगता है।
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बाल्टिक सागर: रूस का सबसे बड़ा रूट
रूस से भारत तेल लाने का पहला और सबसे प्रमुख रास्ता बाल्टिक सागर से होकर गुजरता है। यह रास्ता रूस के प्रिमोर्स्क और उस्त-लूगा बंदरगाहों से शुरू होता है। यहां से बड़े तेल टैंकर उत्तरी सागर, जिब्राल्टर जलडमरूमध्य और भूमध्य सागर को पार करते हैं। इसके बाद वे स्वेज नहर और लाल सागर से होते हुए अरब सागर में प्रवेश करते हैं। इस पूरे सफर को तय करने में आमतौर पर 25 से 30 दिन का समय लगता है। लंबी दूरी के बावजूद, यह मार्ग भारत के लिए सबसे ज्यादा भरोसेमंद बना हुआ है।
काला सागर: कम समय वाला विकल्प
रूस का दूसरा महत्वपूर्ण मार्ग काला सागर में स्थित नोवोरोसिस्क टर्मिनल से शुरू होता है। यह मार्ग बाल्टिक सागर वाले रास्ते की तुलना में काफी छोटा है। यहां से टैंकर तुर्की के जलडमरूमध्य को पार कर भूमध्य सागर में आते हैं और फिर स्वेज नहर के रास्ते भारत पहुंचते हैं। इस रूट से तेल पहुंचने में मात्र 15 से 20 दिन लगते हैं। इस रास्ते की कुल दूरी करीब 4200 नॉटिकल मील है, जो इसे आर्थिक और समय की दृष्टि से बेहद प्रभावी बनाती है। यही वजह है कि भारत इस रूट का भी खूब इस्तेमाल कर रहा है।
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शिप-टू-शिप ट्रांसफर का सीक्रेट खेल
प्रतिबंधों की काट ढूंढने के लिए रूस ने 'शिप-टू-शिप' (STS) ट्रांसफर का सहारा लिया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो समुद्र के बीचों-बीच अंजाम दी जाती है। इसमें रूसी तेल को पहले छोटे टैंकरों में भरा जाता है। फिर खुले समुद्र में, निगरानी से दूर, इसे दूसरे बड़े जहाजों में ट्रांसफर कर दिया जाता है। अक्सर इन जहाजों पर सीधे तौर पर कोई प्रतिबंध नहीं होता, जिससे अंतरराष्ट्रीय नियमों की पकड़ में आए बिना तेल की सप्लाई जारी रहती है। यह तरीका प्रतिबंधों को बेअसर कर देता है।
भारत के लिए रूसी तेल की अहमियत
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत को बड़ी मात्रा में सस्ते कच्चे तेल की जरूरत होती है। रूस रियायती दरों पर तेल उपलब्ध करा रहा है, जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी 45% तक पहुंच गई है। मार्च 2026 तक भारत का रूसी तेल आयात 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंचने का अनुमान है। यह आंकड़ा भारत और रूस के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग और कूटनीति की सफलता को दर्शाता है।
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