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नीलू की कलम से: पैड की पीड़ा
वह परेशानी जिससे बड़ी उम्र की कामकाजी महिलाएं तक डील नहीं कर पातीं,ये मासूम बच्चियां सयानेपन से छिपा ले जाती हैं। पर ये...
मिथिलेश के मन से: हंसोगे भी! पूछोगे भी!!
हम एक चिट्ठी लिखना चाहते हैं। हम लिखना चाहते हैं कि धरती के लोगों से हमारा जी भर गया। यह भी कि वह धरती जहां हम पैदा हु...
नीलू की कलम से: जाफरानी
मैंने एक गाना सुन रखा था 'काली तेरी चोटी है फराना तेरा नाम है।'(काली तेरी चोटी है परांदा तेरा लाल नी) जाफरानी को लंबी चो...
नीलू की कलम से: गोपी गीत
आनंद के दो रूप है त्याग और तृप्ति। कृष्ण की प्रेप्सा ने आनंद का दूसरा रूप चुना । अन्नमय देह के त्याग से मनोमय देह में अभ...
नीलू की कलम से: कीवी v/s काचरा
एक जमाना था जब 'एक अनार सौ बीमार' की कहावत चलती थी पर अब तो 'एक कीवी- दीर्घजीवी' की कहावत आने वाली है। हाल-चाल पूछने वाल...
शिक्षक दिवस पर मिथिलेश के मन से: सीखने- सिखाने के लिए गुरु से ज्यादा ज़रूरी होता है हमारा जुनून
गुरु का काम ऊर्जावान बनाना होता है लेकिन आग जैसा कुछ अगर हमारे भीतर नहीं है तो वह क्या कर लेगा? कहां से ऊर्जा लायेगा वह...
मिथिलेश के मन से: रुक जा रात, ठहर जा रे चंदा ( बरस्ता कचौड़ी गली) दूसरी किश्त
इसका नाम कचौड़ी गली क्यों पड़ गया? किसने इसे यह नाम दिया और दिया तो फिर पुराना नाम गायब क्यों हो गया? सरकारी दस्तावेज तक...
मिथिलेश के मन से: कचौड़ी गली सून कइलs बलमू - पहली किश्त
बूढ़ों के पास निपढ़ औरतों के इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता। वे झींकते हैं। वे खीझते हैं। वे अपनी चुप्पी पर सिर खुजाते है...
मिथिलेश के मन से: पंख होते तो उड़ आती रे...
एक लड़की गा रही है। हीरोइन रही होगी। वह गा रही है- पंख होती तो उड़ आती रे... रसिया ओ बालमा, तुझे दिल के दाग दिखलाती रे.....
मिथिलेश के मन से: कबीर और ग़ालिब
ग़ालिब और कबीर के बीच लगभग चार सदी का जो फासला है, क्या इन चार सौ वर्षों में यह दुनिया नहीं बदली? सोचिएगा आप भी। हम भी स...
नीलू की कलम से: पिटबुल के बहाने..
जिसने यह हिंसा की वह पशु था पर जिसने उसे तीन वर्ष तक बच्चे की तरह पाला वह एक इंसान था। माता-पिता या परिवार के साथ हिंसक...
नीलू की कलम से: उकारड़ा
हमारे यहां इसे अकुरड़ा या अकुरड़ी कहते हैं।सामान्यतः हिंदी में इसे कचरे और गोबर का ढेर कहा जा सकता है,पर वास्तव में यह ए...
नीलू की कलम से: केश सज्जा
गर्मियों की दोपहर में जब सब लोग सो जाते तो घर में उपलब्ध केश-सज्जा-सामान- रंगीन,मखमली, मोतियों वाले रबड़, बकल,चोटीले और...
नीलू की कलम से: वाल्मीकि समाज और राजपूताने की परम्पराएं
रावळों के साथ वाल्मीकि परिवार का संबंध व्यवसायिक न होकर व्यक्तिगत रहा है। प्रत्येक रावळे का अपना एक मेहतर होता है जो उनक...